चंडीगढ़ , 18 जुलाई 2026 । पंजाब में आगामी चुनावों को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव के संकेत दिए हैं। पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, नए सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने पर जोर दे रही है। इसी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभाओं और संवाद शैली में भी स्थानीय मुद्दों, विकास और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को अधिक महत्व दिए जाने को राजनीतिक विश्लेषक भाजपा की नई रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं।
1980 के बाद से अपने ज्यादातर इतिहास में, बीजेपी शिरोमणि अकाली दल के साथ दूसरे नंबर की पार्टी बनकर ही खुश थी। बीजेपी विधानसभा की 117 सीटों में से सिर्फ 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। इस गठबंधन को पांच बार मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल ने नाखून और मांस का रिश्ता बताया था। उग्रवाद के दौर में समाज में आई दरारों के बाद, इस गठबंधन को सांप्रदायिक सद्भाव की गारंटी के तौर पर देखा जाता था। बीजेपी से पहले भी, अकाली दल ने अक्सर चुनावों के बाद सरकार बनाने के लिए बीजेपी की पूर्ववर्ती पार्टी, भारतीय जनसंघ के साथ गठबंधन किया था।
भाजपा का फोकस इस बार केवल पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित नहीं है। पार्टी सिख समुदाय, युवाओं, किसानों, महिलाओं और शहरी मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इसके लिए संगठनात्मक विस्तार, नए चेहरों को जिम्मेदारी और क्षेत्रवार चुनावी अभियान को गति दी जा रही है। हाल ही में वरिष्ठ सिख नेताओं को अहम जिम्मेदारियां सौंपे जाने को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में पंजाब के विकास, निवेश, उद्योग, सीमा सुरक्षा, नशे के खिलाफ अभियान और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों पर अधिक जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ राज्य की स्थानीय चिंताओं को भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाना है।
हालांकि, भाजपा की यह नई रणनीति चुनावी नतीजों में कितना असर दिखाएगी, यह मतदाताओं के फैसले पर निर्भर करेगा। पंजाब में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के बीच बहुकोणीय मुकाबले की संभावना है। ऐसे में सभी दल अपनी-अपनी रणनीति के साथ चुनावी मैदान में उतर रहे हैं और आने वाले महीनों में राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की उम्मीद है।