पंजाब , 01 मई 2026 । पंजाब की सियासत में उस वक्त हलचल तेज हो गई जब राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल और राजिंदर गुप्ता पर हुई रेड को लेकर राज्यसभा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने आम आदमी पार्टी की सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए सवाल उठाया कि आखिर उन्होंने पार्टी छोड़ने के तुरंत बाद ही उनके ठिकानों पर रेड क्यों डलवाई गई। उन्होंने इस कार्रवाई के समय और मंशा दोनों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
जानकारी के अनुसार विक्रमजीत सिंह साहनी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर ट्वीट कर इस बात की कड़ी निंदा की है। उन्होंने आम आदमी पार्टी की सरकार से सवाल पूछे हैं कि आखिर राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल और राजिंदर गुप्ता के पार्टी छोड़ने के एक दिन बाद ही वे डिफॉल्टर कैसे हो गए। उन्होंने कहा कि एक तरफ पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार ने लोगों को विश्वास दिलाया है कि इन्वेस्टरों को राज्य में इन्वेस्ट करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। और दूसरी तरफ पंजाब में ही इन्वेस्टरों पर ऐसी कार्रवाइयां की जा रही हैं। ऐसे में लवली और ट्राइडेंट ग्रुप पर कार्रवाई करके राज्य सरकार इन्वेस्टरों को क्या मैसेज देना चाहती है? उन्होंने सवाल पूछते कहा कि दोनों सांसदों ने जैसे ही उनकी पार्टी छोड़कर भाजपा ज्वाइन की वैसे ही वे डिफॉल्टर कैसे हो गए। क्या एक ही दिन में प्रदूषण फैलने लगा या फिर क्या एक ही दिन में जी.एस.टी. के नियमों की उल्लंघना हो गई?
साहनी का कहना है कि यह महज एक संयोग नहीं हो सकता कि जैसे ही उन्होंने पार्टी से दूरी बनाई, वैसे ही जांच एजेंसियों की सक्रियता अचानक बढ़ गई। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित हो सकती है, जिसका मकसद उन्हें दबाव में लाना है।
वहीं, Punjab सरकार की ओर से इन आरोपों को खारिज किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि सभी कार्रवाई कानून और तय प्रक्रियाओं के तहत की जाती हैं और किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता। उनका दावा है कि यदि किसी के खिलाफ सबूत मिलते हैं, तो जांच एजेंसियां स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के विवाद चुनावी माहौल में अक्सर देखने को मिलते हैं, जहां कार्रवाई के समय को लेकर सवाल उठते हैं और इसे राजनीतिक रंग दे दिया जाता है। हालांकि, सच्चाई क्या है, यह पूरी तरह जांच के बाद ही सामने आएगी।
यह मामला अब केवल एक रेड तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक निष्पक्षता और राजनीतिक पारदर्शिता की बहस को भी जन्म दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि जांच एजेंसियां क्या निष्कर्ष निकालती हैं और इस पर राजनीतिक प्रतिक्रिया किस दिशा में जाती है।