तेहरान/वॉशिंगटन , 15 जून् 2026 । अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की चर्चाओं के बीच इजराइल ने इस तरह के किसी भी समझौते को लेकर अपनी गंभीर आपत्तियां सामने रखी हैं। इजराइली नेतृत्व का मानना है कि यदि समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमताओं और क्षेत्रीय गतिविधियों पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो इससे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है।
वहीं, इजराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतमार बेन ग्वीर ने पीस डील पर नाराजगी जताते हुए कहा, “हम अमेरिका के गुलाम नहीं है। इजराइल एक आजाद देश हैं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का यह समझौता इजराइल पर लागू नहीं होता।”
इधर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बताया कि अमेरिका-ईरान 19 जून को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में पीस डील पर दस्तखत करेंगे। अगर ऐसा होता है तो 47 साल में तेहरान और वॉशिंगटन के बीच यह पहली हाई लेवल बैठक होगी।
इजराइल लंबे समय से ईरान को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मानता रहा है। इजराइली अधिकारियों का तर्क है कि केवल कूटनीतिक समझौते पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ऐसे किसी भी समझौते में कठोर निगरानी और स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान शामिल होने चाहिए। उनका कहना है कि ईरान को आर्थिक या राजनीतिक राहत देने से पहले उसके परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव से जुड़े मुद्दों का समाधान आवश्यक है।
दूसरी ओर, अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय पक्ष तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान तलाशने के प्रयासों में जुटे हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच किसी प्रकार का समझौता होता है, तो उसका असर न केवल मध्य पूर्व बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर मध्य पूर्व की जटिल राजनीति को सुर्खियों में ला दिया है। आने वाले दिनों में अमेरिका, ईरान और इजराइल के रुख पर दुनिया की नजर बनी रहेगी, क्योंकि इन देशों के बीच होने वाले किसी भी बड़े फैसले का असर क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा सकता है।