चंडीगढ़ , 03 जून् 2026 । हरियाणा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है, जिसे भविष्य के कई मामलों के लिए मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला की दुर्घटना या अन्य परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है और वह अपने सास-ससुर का भी भरण-पोषण कर रही थी, तो ऐसे मामलों में सास-ससुर भी मुआवजे के दावेदार हो सकते हैं।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस यशवीर सिंह राठौर की पीठ ने 24 वर्ष पुराने एक सड़क हादसे से जुड़े मामले में वृद्ध दंपती को बड़ी राहत प्रदान की है। अदालत ने दिवंगत बहू शोभा रानी की मौत पर 8.66 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जबकि बेटे बलविंदर सिंह की मृत्यु पर पहले निर्धारित 1.38 लाख रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर 7.14 लाख रुपये कर दिया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मुआवजा केवल पति, बच्चों या माता-पिता तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि यह साबित हो जाए कि मृतक महिला परिवार के अन्य सदस्यों, विशेष रूप से सास-ससुर की आर्थिक सहायता कर रही थी और वे उस पर निर्भर थे, तो उन्हें भी कानूनी रूप से आश्रित माना जा सकता है।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि बदलते सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को देखते हुए आश्रितों की परिभाषा को व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। आज कई परिवारों में महिलाएं भी प्रमुख कमाने वाली सदस्य होती हैं और उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला उन परिवारों के लिए राहत का मार्ग खोल सकता है, जहां बहू की आय पर बुजुर्ग सास-ससुर की आजीविका निर्भर थी। अदालत का यह दृष्टिकोण सामाजिक वास्तविकताओं और आर्थिक निर्भरता के आधार पर अधिकारों की व्याख्या को मजबूत करता है।
इस फैसले को महिलाओं की आर्थिक भूमिका की न्यायिक मान्यता के रूप में भी देखा जा रहा है। साथ ही यह निर्णय भविष्य में मोटर दुर्घटना दावा, बीमा और मुआवजा मामलों में महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।