चंडीगढ़ , 08 जुलाई 2026 । अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर उठे विवाद के बीच पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) केपीएस गिल एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। फिल्म को लेकर हो रही बहस में जसवंत सिंह खालड़ा का नाम भी सामने आने से 1990 के दशक के पंजाब और उस दौर की घटनाओं पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है।
सुपरकॉप के कार्यकाल में लापता हुए थे खालरा
समाजसेवी जसवंत सिंह खालरा ने आतंकवाद को कुचलने के सुपरकॉप के अभियान के दौरान लापता लोगों की तलाश शुरू की थी। उन्होंने लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का मुद्दा उठाकर आतंकवाद विरोधी अभियान पर सवालिया निशान लगाए थे। 6 सितंबर 1995 को खालड़ा लापता हो गए थे। उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने पति को इंसाफ देने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने इस केस की जांच की। CBI की जांच में उनकी हत्या की पुष्टि हुई मगर खालरा का शव कभी बरामद नहीं हो सका। 2005 में कोर्ट ने दोषी 6 पुलिसकर्मियों को सजा दी।
केपीएस गिल को पंजाब में उग्रवाद विरोधी अभियान का नेतृत्व करने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में जाना जाता है। उनके समर्थक उन्हें आतंकवाद पर नियंत्रण पाने का श्रेय देते हैं, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने उस दौर में कथित फर्जी मुठभेड़ों, जबरन गायब किए गए लोगों और अन्य मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे।
जसवंत सिंह खालड़ा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जिन्होंने पंजाब में कथित अवैध अंतिम संस्कार और लापता लोगों के मामलों को सार्वजनिक किया था। वर्ष 1995 में उनका अपहरण कर लिया गया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई। इस मामले में पंजाब पुलिस के कुछ अधिकारियों को दोषी ठहराया गया था। हालांकि, केपीएस गिल को इस मामले में दोषी नहीं ठहराया गया था, लेकिन उस समय वे राज्य के पुलिस प्रमुख होने के कारण उनका नाम अक्सर उस दौर की चर्चाओं में लिया जाता है।
फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर चल रहे विवाद में कुछ लोगों का दावा है कि इसमें पंजाब के उस दौर की घटनाओं और पात्रों का संदर्भ है। हालांकि, फिल्म की सामग्री और उससे जुड़े दावों पर अलग-अलग पक्षों की अपनी-अपनी राय है। इस कारण केपीएस गिल और जसवंत सिंह खालड़ा का नाम एक बार फिर सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है।