हरियाणा की नगर परिषदों में नियुक्तियों पर सवाल, 23 में से 13 परिषदों में सीईओ तैनाती को लेकर उठा विवाद

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हरियाणा , 04 जून्‌ 2026 । हरियाणा में शहरी निकाय प्रशासन एक नए विवाद के केंद्र में आ गया है। राज्य की 23 नगर परिषदों में से 13 में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्तियों को लेकर कानूनी और प्रशासनिक सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि इन परिषदों में तैनात किए गए अधिकारियों की नियुक्ति प्रक्रिया में निर्धारित नियमों और कानूनी प्रावधानों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया, जिससे प्रशासनिक पारदर्शिता और वैधानिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लग गया है।

मामले को लेकर विभिन्न सामाजिक संगठनों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों ने चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि नगर परिषद जैसे महत्वपूर्ण शहरी निकायों में नियुक्तियां पूरी तरह कानून और नियमों के अनुरूप होनी चाहिए, क्योंकि इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से स्थानीय विकास योजनाएं, नागरिक सुविधाएं और शहरी प्रशासन संचालित होता है। यदि नियुक्तियों में किसी प्रकार की अनियमितता होती है, तो इसका सीधा असर प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जनता के हितों पर पड़ सकता है।

जानकारों के अनुसार, नगर परिषदों में सीईओ की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। वे विकास कार्यों के क्रियान्वयन, वित्तीय प्रबंधन, सरकारी योजनाओं की निगरानी और प्रशासनिक समन्वय के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में उनकी नियुक्ति को लेकर उठे सवाल केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि सुशासन और जवाबदेही से जुड़ा विषय बन गया है।

विपक्षी दलों ने इस मामले को सरकार की कार्यशैली से जोड़ते हुए पारदर्शी जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि यदि नियमों की अनदेखी कर नियुक्तियां की गई हैं तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वहीं सरकार और संबंधित विभाग की ओर से अब तक यही कहा जा रहा है कि सभी नियुक्तियां प्रशासनिक आवश्यकताओं और प्रचलित प्रक्रियाओं के तहत की गई हैं। हालांकि विवाद बढ़ने के बाद मामले की समीक्षा और कानूनी पहलुओं की जांच की मांग तेज हो गई है।

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सरकारी नियुक्ति में नियमों का पालन सर्वोपरि होना चाहिए। इससे न केवल संस्थाओं की विश्वसनीयता बनी रहती है, बल्कि भविष्य में कानूनी विवादों और प्रशासनिक बाधाओं से भी बचा जा सकता है। हरियाणा की नगर परिषदों में सीईओ नियुक्तियों को लेकर उठे सवाल अब राज्य के शहरी प्रशासन और शासन व्यवस्था की पारदर्शिता की परीक्षा बनते जा रहे हैं।

आने वाले दिनों में यदि इस मामले की विस्तृत जांच होती है या सरकार की ओर से कोई स्पष्टीकरण जारी किया जाता है, तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि विवाद के पीछे वास्तविक स्थिति क्या है और क्या नियुक्तियों में किसी प्रकार की प्रक्रिया संबंधी त्रुटि हुई है।

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