नई दिल्ली, 01 जून् 2026 । एफएमजीई परीक्षादिल्ली के साकेत इलाके में हुए दर्दनाक हादसे ने एक परिवार की खुशियां हमेशा के लिए छीन लीं। जिस बेटी को उसके माता-पिता डॉक्टर के सफेद कोट में देखने का सपना संजोए हुए थे, वह सपना एक पल में बिखर गया। परिवार ने वर्षों तक उसकी पढ़ाई और भविष्य के लिए मेहनत की थी। बेटी भी चिकित्सा क्षेत्र में करियर बनाकर लोगों की सेवा करना चाहती थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
राजस्थान के अलवर में शनिवार दोपहर तक रमेश चंद के घर खुशियों का माहौल था। बेटी एकता का फोन आया था। उसने बताया था कि एग्जाम अच्छा गया है। परिवार को यकीन था कि वर्षों की मेहनत अब रंग लाने वाली है। पर किसी को नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी बातचीत होगी। कुछ घंटे बाद रात करीब 9 बजे फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ एकता के दोस्त थे। कांपती आवाज सुनकर रमेश चंद का दिल बैठ गया।
हादसे की खबर मिलते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। परिजनों का कहना है कि बेटी पढ़ाई में बेहद होनहार थी और डॉक्टर बनने के लिए लगातार मेहनत कर रही थी। घर में अक्सर उसकी पढ़ाई और भविष्य की योजनाओं को लेकर चर्चा होती थी। माता-पिता को उम्मीद थी कि एक दिन उनकी बेटी सफेद कोट पहनकर अस्पताल में मरीजों का इलाज करेगी और परिवार का नाम रोशन करेगी।
लेकिन हादसे के बाद वही बेटी सफेद कफन में घर पहुंची, जिसने पूरे इलाके को गमगीन कर दिया। अंतिम दर्शन के दौरान परिजनों और पड़ोसियों की आंखें नम थीं। हर किसी की जुबान पर यही सवाल था कि आखिर इतनी कम उम्र में एक उज्ज्वल भविष्य का अंत क्यों हो गया। माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है और परिवार अभी भी इस सदमे से उबर नहीं पा रहा है।
- उन्होंने बताया कि सैदुलाजाब में एक इमारत गिर गई है और रात का खाना खाने गई एकता से संपर्क नहीं हो पा रहा है। सुनते ही पूरा परिवार सदमे में आ गया।
- परिवार रातोंरात दिल्ली के लिए निकल पड़ा। दिल्ली पहुंचकर रमेश चंद उस मलबे के पास खड़े हो गए, जिसके नीचे उनकी बेटी के होने की आशंका थी।
- हर बार जब कोई बचावकर्मी बाहर आता, उनकी नजरें उसके चेहरे पर टिक जातीं।
- हर स्ट्रेचर को उम्मीद से देखते। करीब 19 घंटे रविवार दोपहर 4 बजे जब बचाव दल ने मलबे से एकता का शव निकाला तो पिता की उम्मीदों का आखिरी धागा भी टूट गया।
- जिस बेटी को डॉक्टर के सफेद कोट में देखने का सपना उन्होंने संजोया था, वह सफेद कफन में घर लौटने वाली थी।
- पिता बताते हैं कि गांव से जब भी कोई स्टूडेंट दिल्ली आता था, वह उसके हाथों बेटी के लिए घर का देसी घी, मिठाई भेजते थे। लेकिन अब वही पिता अपनी बेटी के सामान को देख-देखकर रो रहे हैं।
इस घटना ने न केवल एक परिवार के सपनों को तोड़ा है, बल्कि समाज को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि एक हादसा कितनी जिंदगियों को प्रभावित कर सकता है। जिस बेटी के भविष्य को लेकर बड़े-बड़े सपने बुने गए थे, उसकी असमय मौत ने पूरे क्षेत्र में शोक की लहर फैला दी है।