जौहर यूनिवर्सिटी विवाद पर इमरान प्रतापगढ़ी की शायरी से सियासी हलचल

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रामपुर , 17  जुलाई 2026 । जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी चर्चाओं के बीच कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने सोशल मीडिया पर एक शायरी साझा कर नई बहस छेड़ दी। उन्होंने लिखा, “बस ढहाना ही सीख पाए, क्या कभी कुछ बना भी पाओगे।” उनकी यह टिप्पणी जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े घटनाक्रम के संदर्भ में देखी जा रही है और राजनीतिक गलियारों में इसकी व्यापक चर्चा हो रही है।

पूर्व कैबिनेट मंत्री और समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर सियासत तेज हो गई है। दरअसल, रामपुर प्रशासन ने जौहर यूनिवर्सिटी परिसर में बने 40 भवनों में से 38 को अवैध घोषित किया है। जांच में सामने आया कि इन 38 भवनों के लिए जिला पंचायत से नक्शा ही पास नहीं कराया गया था। अब 15 दिन बाद इन 38 भवनों के ऊपर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हो सकती है।

केवल 2 भवनों के नक्शे पर बना लिए 40 भवन

आपको बता दें कि रामपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और जिले के डीएम ने यूनिवर्सिटी प्रबंधन को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया था। 15 जुलाई को मामले में सुनवाई हुई और सभी दस्तावेजों की जांच की गई। जांच में पाया गया कि जिस समय यूनिवर्सिटी में भवनों का निर्माण किया गया, उस समय वह क्षेत्र जिला पंचायत के तहत आता था, लेकिन जिला पंचायत से भवनों का नक्शा पास नहीं कराया गया। यूनिवर्सिटी परिसर के 40 भवनों में से केवल 2 का ही नक्शा पास कराया गया था।

इमरान प्रतापगढ़ी की इस शायरी के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष के समर्थकों के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। समर्थकों ने इसे शिक्षा संस्थानों और विरासत को बचाने का संदेश बताया, जबकि विरोधियों ने इसे राजनीतिक टिप्पणी करार देते हुए आलोचना की। देखते ही देखते यह पोस्ट विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो गई।

जौहर यूनिवर्सिटी लंबे समय से कानूनी और प्रशासनिक मामलों को लेकर चर्चा में रही है। ऐसे में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आती रही हैं। इमरान प्रतापगढ़ी की शायरी ने एक बार फिर इस मामले को सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संवेदनशील मुद्दों पर नेताओं की सोशल मीडिया प्रतिक्रियाएं अक्सर व्यापक राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बन जाती हैं। ऐसे मामलों में समर्थकों और विरोधियों की अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती हैं, जिससे राजनीतिक बहस और तेज हो जाती है।

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