पाकिस्तान सरकार का बड़ा फैसला: 9 इस्लामिक ऐतिहासिक स्थलों के नाम बदलने का प्रस्ताव खारिज

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इस्लामाबाद, 27 मई 2026 । पाकिस्तान में धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान से जुड़े मुद्दे पर सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। देश की नौ प्रमुख इस्लामिक जगहों के नाम बदलने की मांग को सरकार ने खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। सरकार का कहना है कि इन स्थानों की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान बरकरार रखना जरूरी है और नाम बदलने से सांस्कृतिक विरासत प्रभावित हो सकती है।

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मरियम नवाज सरकार ने लाहौर की सड़कों, चौकों और इलाकों के पुराने नाम बहाल करने का फैसला फिलहाल टाल दिया है। सरकार जिन नामों को बहाल करना चाहती थी, उनमें कई हिंदू और सिख दौर के नाम शामिल थे।

सरकार ने यह कदम कट्टरपंथी समूहों और सोशल मीडिया पर बढ़ते विरोध के बाद उठाया। कुछ लोगों ने इसे हिंदू और सिख पहचान वापस लाने की कोशिश बताते हुए धार्मिक रंग दे दिया था।

लाहौर के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन (रिटायर्ड) मोहम्मद अली एजाज ने पाकिस्तानी अखबार डॉन से कहा कि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।

नवाज शरीफ और मरियम नवाज की बैठक में मंजूर हुआ था प्रस्ताव

16 मार्च को लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल (LHAR) की बैठक हुई थी। इसकी अध्यक्षता पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने की थी। पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज भी इसमें शामिल थीं। इसी बैठक में लाहौर के कई पुराने प्री-पार्टिशन नाम बहाल करने का प्रस्ताव पास किया गया।

यह योजना लाहौर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को फिर से सामने लाने के लिए बनाई गई थी। बाद में मई में मरियम नवाज कैबिनेट ने भी इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी थी।

नवाज शरीफ का कहना था कि हमें यूरोप से सीख लेनी चाहिए। वे ऐतिहासिक नामों से छेड़छाड़ नहीं करते हैं। मरियम का कहना था कि लाहौर का इतिहास ही इसकी पहचान है। पुराने नाम और इमारतें इसका सबूत हैं।

यह पूरा प्रोजेक्ट लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल (LAHR) के तहत चलाया जा रहा था। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, यह कई अरब पाकिस्तानी रुपए का प्रोजेक्ट है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दे हमेशा संवेदनशील रहे हैं। ऐसे मामलों में सरकार अक्सर संतुलित रुख अपनाने की कोशिश करती है ताकि किसी भी तरह का सामाजिक तनाव पैदा न हो।

सोशल मीडिया पर भी इस फैसले को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे धार्मिक विरासत की रक्षा बता रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि ऐतिहासिक मामलों पर खुली चर्चा होनी चाहिए।

फिलहाल सरकार ने साफ कर दिया है कि संबंधित इस्लामिक स्थलों के नामों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और उनकी मौजूदा पहचान बरकरार रहेगी।

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