नई दिल्ली, 22 जुलाई 2026 । भारत में चल रहे छात्र प्रदर्शन को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी चर्चा तेज हो गई है। कई विदेशी मीडिया संस्थानों ने छात्रों के विरोध प्रदर्शन, प्रशासन की कार्रवाई और आंदोलन से जुड़े घटनाक्रमों को प्रमुखता से रिपोर्ट किया है। न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) और द गार्जियन जैसी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थाओं ने छात्र आंदोलन को लेकर अपनी रिपोर्ट में प्रदर्शनकारियों के रुख और उनकी मांगों का जिक्र किया है।
न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्डियन, बीबीसी समेत कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इसे प्रमुखता से कवर किया है।
सोमवार को CJP ने जंतर-मंतर से संसद तक मार्च निकाला। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई, आंसू गैस के गोले छोड़े गए और पथराव भी हुआ। दोनों पक्षों के कई लोग घायल हुए।
अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि खून बहा, लाठियां चलीं, आंसू गैस के गोले दागे गए, लेकिन प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे। संसद मार्च के अगले ही दिन हजारों छात्र फिर जंतर-मंतर पहुंच गए और सरकार से जवाब मांगने लगे।
अखबार के मुताबिक, छात्र शिक्षा व्यवस्था और भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार अब भी उनकी मांगों पर चुप है।
रिपोर्ट में आंदोलनकारी संगठनों के हवाले से 150 प्रदर्शनकारियों के घायल होने का दावा किया गया है। वहीं, दिल्ली पुलिस का कहना है कि 118 पुलिसकर्मी घायल हुए और करीब 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
ब्रिटेन के अखबार गार्डियन ने लिखा कि पुलिस की कार्रवाई भी छात्र आंदोलन को रोक नहीं सकी। सोमवार की झड़प के अगले दिन हजारों प्रदर्शनकारी फिर जंतर-मंतर पहुंच गए और साफ कर दिया कि वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
कतर के न्यूज चैनल अल जजीरा ने लिखा कि छात्र आंदोलन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं, विपक्ष के नेता राहुल गांधी खुलकर प्रदर्शनकारियों के समर्थन में उतर आए।
ब्रिटेन के टीवी BBC ने लिखा कि पुलिस कार्रवाई में महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया। कई प्रदर्शनकारियों ने BBC को बताया कि लाठीचार्ज के दौरान महिलाओं के साथ भी सख्ती की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस कार्रवाई के अगले दिन भी हजारों प्रदर्शनकारी फिर जंतर-मंतर पहुंचे और आंदोलन जारी रखा। पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर बना मंच और अस्थायी टेंट भी हटा दिए।
पाकिस्तान के अखबार डॉन ने लिखा कि छात्र आंदोलन ने विपक्ष को मोदी सरकार पर हमला बोलने का नया मौका दे दिया है। पुलिस कार्रवाई के बाद लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दल प्रदर्शनकारियों के समर्थन में उतर आए।
रिपोर्ट में कहा गया कि बड़ी संख्या में युवाओं के सड़कों पर उतरने और पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें सामने आने के बाद आंदोलन को राजनीतिक समर्थन मिलने लगा।
छात्र आंदोलनों को लेकर भारत में भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। जहां एक ओर प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर संघर्ष जारी रखने की बात कह रहे हैं, वहीं प्रशासन कानून व्यवस्था बनाए रखने और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लोकतंत्र में छात्र आंदोलनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि युवा वर्ग सामाजिक और नीतिगत मुद्दों पर अपनी आवाज उठाता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मीडिया की कवरेज ने इस पूरे मामले को वैश्विक स्तर पर भी चर्चा का विषय बना दिया है।