देहरादून, 22 जुलाई 2026 । उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे एक व्यक्ति को रास्ते में हिरासत में लेने के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी व्यक्ति को केवल प्रदर्शन में शामिल होने के लिए रास्ते से रोकना और हिरासत में लेना उचित नहीं है। अदालत ने पुलिस के इस रवैये पर सवाल उठाते हुए इसे “गुंडागर्दी” जैसा व्यवहार बताया।
क्या विरोध प्रदर्शन में शामिल होना संज्ञेय अपराध?
हाईकोर्ट के जस्टिस रवींद्र मैथानी और सिद्धार्थ साह की डिवीजन बेंच ने कहा, ‘देश में कहीं भी आने-जाने का अधिकार हर किसी को है, उन्हें रोकने वाले आप कौन होते हैं? क्या विरोध प्रदर्शन में शामिल होना कोई संज्ञेय अपराध है? यह पुलिस की सरासर गुंडागर्दी है।’ हाई कोर्ट ने कहा, ‘यह अराजकता के बराबर है। हम एक संवैधानिक व्यवस्था के तहत रह रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा या सरकार की छवि के नाम पर लोगों को परेशान न करें।’
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार नागरिकों को संविधान से मिला है। यदि कोई व्यक्ति कानून व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश नहीं कर रहा है, तो उसे केवल विरोध प्रदर्शन में जाने के कारण रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने पुलिस को अधिकारों और कानून की सीमाओं का पालन करने की नसीहत दी।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में आरोप लगाया गया था कि वह एक प्रदर्शन में शामिल होने जा रहा था, लेकिन पुलिस ने उसे रास्ते से ही हिरासत में ले लिया। इसे चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस से कार्रवाई का आधार और कारण पूछा।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासन की जिम्मेदारी कानून व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन इसके नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। अदालत ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए कि भविष्य में ऐसी कार्रवाई करते समय संवैधानिक अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया का ध्यान रखा जाए।
इस आदेश के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली और विरोध प्रदर्शनों के दौरान अपनाए जाने वाले रवैये को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह रुख शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस की जवाबदेही के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है।