नाबालिग नहीं, लेकिन शादी की कानूनी उम्र से कम: लिव-इन रिश्ते पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

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नई दिल्ली , 11 जून्‌ 2026 । लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से साथ रहना चाहते हैं, तो उन्हें सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे रिश्तों को संबंधित प्रावधानों के तहत पंजीकृत कराना आवश्यक होगा। अदालत की यह टिप्पणी विशेष रूप से उन मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां युवक-युवती शादी की कानूनी उम्र पूरी नहीं कर पाए हैं, लेकिन साथ रहने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

लिव-इन में रह रहे कपल में लड़की की उम्र 19 साल और लड़के की उम्र 18 साल है। वे दोनों एक ही धर्म के हैं। इस कपल ने कोर्ट को बताया कि वे करीब एक महीने से साथ रह रहे हैं। वे लड़के के शादी के लिए आवश्यक कानूनी उम्र (21 साल) तक पहुंचने के बाद शादी करना चाहते हैं। चूंकि लड़का अभी 18 साल का है, इसलिए वे अभी शादी नहीं कर सकते हैं। इसी कारण उन्होंने मौजूदा लिव-इन अरेंजमेंट के लिए सुरक्षा मांगी थी।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एक जोड़े ने सुरक्षा की मांग की थी। उनका कहना था कि परिवार और समाज के विरोध के कारण उन्हें खतरा महसूस हो रहा है। हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार को संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार बताते हुए कहा कि किसी भी वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और उसके साथ रहने का अधिकार है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे संबंधों को कानून के दायरे में लाने के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) के तहत निर्धारित नियमों का पालन किया जाना चाहिए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सुरक्षा प्रदान करने का उद्देश्य किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना है, न कि किसी कानूनी प्रक्रिया से छूट देना। इसलिए यदि लिव-इन संबंधों के पंजीकरण का प्रावधान लागू है, तो संबंधित जोड़े को अपने रिश्ते का पंजीकरण कराना होगा। न्यायालय की इस टिप्पणी को व्यक्तिगत अधिकारों और कानूनी जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला उन युवाओं के लिए मार्गदर्शक हो सकता है जो विवाह के बजाय लिव-इन रिलेशनशिप को चुन रहे हैं। अदालत ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान किया जाएगा, लेकिन उसके साथ कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन भी अनिवार्य होगा। इससे भविष्य में ऐसे मामलों के निपटारे के लिए एक स्पष्ट कानूनी दृष्टिकोण विकसित हो सकता है।

यह निर्णय समान नागरिक संहिता और लिव-इन संबंधों को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस के बीच आया है। ऐसे में अदालत की यह टिप्पणी न केवल संबंधित पक्षों के लिए बल्कि व्यापक कानूनी और सामाजिक विमर्श के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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