“जहां चुनाव, वहां ED”—जांच एजेंसियों की सक्रियता पर उठते सवाल और सियासी बहस तेज

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नई दिल्ली, 13 जनवरी 2026 । जैसे ही किसी राज्य या देश में चुनावी माहौल बनता है, वैसे ही प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाइयों में अचानक तेजी आना एक बार फिर सियासी बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि “जहां चुनाव, वहां ED” की कहावत अब राजनीतिक गलियारों में हकीकत बनती जा रही है। चुनाव से ठीक पहले पुराने मामलों की फाइलें खुलना, नेताओं से पूछताछ और छापेमारी—इन सबने जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) की बढ़ती सक्रियता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। ED का काम आर्थिक अपराधों की जांच करना, काले धन और मनी लॉन्ड्रिंग पर रोक लगाना है, लेकिन कई बार उसकी कार्रवाई की टाइमिंग सवालों के घेरे में आ जाती है।

ताजा मामला कोलकाता में I-PAC से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी का है, जिसमें सीएम ममता बनर्जी और ED आमने-सामने है। बंगाल में इस साल मई से पहले विधानसभा चुनाव होने हैं।

इससे पहले, 4 साल में 3 राज्यों (झारखंड, दिल्ली, महाराष्ट्र) में ऐसा हो चुका है, जब ED ने पुराने मामलों में चुनाव से कुछ समय पहले बड़ी कार्रवाई की।

इस साल बंगाल समेत तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसी के साथ इन राज्यों में ED ने पुराने मामलों की फाइलें खोलना शुरू कर दिया है।

वहीं, सरकार और जांच एजेंसियों की ओर से इन आरोपों को सिरे से खारिज किया जाता रहा है। उनका तर्क है कि ED अपने कानूनी दायरे में काम करती है और किसी भी मामले में कार्रवाई सबूतों और जांच की प्रगति के आधार पर होती है, न कि चुनावी कैलेंडर के अनुसार। एजेंसियों का कहना है कि आर्थिक अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामलों में समय और राजनीति को अलग करके देखना चाहिए।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर भारत में जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता, जवाबदेही और पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब भी चुनाव के समय ऐसी कार्रवाइयां होती हैं, तो जनता के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। यही वजह है कि बार-बार यह मांग उठती है कि जांच एजेंसियों के कामकाज में स्पष्ट दिशानिर्देश और मजबूत संस्थागत सुरक्षा हो, ताकि कानून का राज बना रहे और लोकतंत्र पर किसी भी तरह का संदेह न पड़े।

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