हलाला रेप’ मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- पॉक्सो कानून पर्सनल लॉ से सर्वोपरि

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प्रयागराज, 04 जुलाई 2026 । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कथित ‘हलाला रेप’ मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में पॉक्सो (POCSO) कानून किसी भी पर्सनल लॉ या धार्मिक परंपरा से ऊपर है। अदालत ने कहा कि यदि किसी नाबालिग के साथ यौन अपराध के आरोप सामने आते हैं, तो केवल यह तर्क देकर कार्रवाई को नहीं रोका जा सकता कि मामला किसी धार्मिक प्रथा या व्यक्तिगत कानून से जुड़ा है।

क्या है निकाह हलाला?

निकाह हलाला एक इस्लामिक प्रथा है जिसके तहत तलाकशुदा महिला को अपने पहले पति से दोबारा शादी करने से पहले किसी अन्य पुरुष से शादी करनी होती है और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने होते हैं। यह एफआईआर अमरोहा जिले के सैदनगली पुलिस स्टेशन में बीएनएस के मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 और पॉक्सो एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज की गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से एफआईआर निरस्त करने की मांग की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया आरोपों की गंभीरता को देखते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच प्रक्रिया पूरी होने देना आवश्यक है और इस स्तर पर न्यायालय एफआईआर को समाप्त नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि पॉक्सो अधिनियम का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से प्रभावी कानूनी संरक्षण देना है, इसलिए इसका पालन सभी परिस्थितियों में अनिवार्य है। यदि किसी मामले में पर्सनल लॉ और पॉक्सो कानून के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, तो बच्चों के हितों की रक्षा करने वाला कानून प्राथमिकता प्राप्त करेगा।

अदालत की इस टिप्पणी को बाल अधिकारों की सुरक्षा और कानून की सर्वोच्चता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब मामले की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया संबंधित एजेंसियों द्वारा जारी रहेगी तथा आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्णय साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।

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