साक्ष्य के अभाव में राहत—उम्र साबित न होने और सहमति के आधार पर दुष्कर्म के आरोपी को बरी

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देहरादून, 18 अप्रैल 2026 । एक महत्वपूर्ण फैसले में अदालत ने दुष्कर्म के आरोपित व्यक्ति को बरी कर दिया, क्योंकि मामले में पीड़िता की उम्र का पुख्ता प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका और दोनों पक्षों के बीच संबंध सहमति से होने के संकेत मिले। यह फैसला आपराधिक मामलों में साक्ष्यों की अहमियत को एक बार फिर रेखांकित करता है।

न्यायालय ने विधि व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए माना कि मेडिकल निर्धारण में 1-2 वर्ष का अंतर हो सकता है, जिससे घटना के समय पीड़िता के बालिग होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की नाबालिग होने का ठोस प्रमाण देने में असफल रहा। ऐसे मामलों में उम्र का प्रमाण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि नाबालिग के साथ किसी भी प्रकार का यौन संबंध कानूनन अपराध माना जाता है, चाहे सहमति हो या नहीं। लेकिन जब उम्र ही साबित न हो सके, तो मामला कमजोर पड़ जाता है।

साथ ही, अदालत ने यह भी देखा कि दोनों के बीच संबंध सहमति से होने के पर्याप्त संकेत मौजूद थे। ऐसे में Indian Penal Code के तहत दुष्कर्म का आरोप सिद्ध नहीं हो पाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है और संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में जांच एजेंसियों को सबूत जुटाने में अधिक सावधानी बरतनी चाहिए, खासकर उम्र से जुड़े दस्तावेज जैसे जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रिकॉर्ड या मेडिकल परीक्षण रिपोर्ट। इनके अभाव में केस कमजोर हो सकता है और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।

यह फैसला न्याय व्यवस्था के उस सिद्धांत को भी दर्शाता है, जिसमें कहा जाता है कि “सौ दोषी छूट जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए।” साथ ही, यह भी जरूरी है कि संवेदनशील मामलों में पीड़ित पक्ष को उचित कानूनी सहायता और समर्थन मिले, ताकि न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

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