पटना , 25 सितंबर 2026 । पटना के जिला परिवहन कार्यालय यानी DTO में मेडिकल सर्टिफिकेट बनाए जाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। आरोप है कि कार्यालय में संबंधित डॉक्टर की नियमित मौजूदगी नहीं होने के बावजूद वाहन चालकों के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट तैयार किए जा रहे हैं। इस मामले ने परिवहन कार्यालय की कार्यप्रणाली और मेडिकल जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला सामने आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि अगर मेडिकल जांच के लिए निर्धारित डॉक्टर मौके पर मौजूद नहीं हैं, तो आवेदकों की स्वास्थ्य जांच किस आधार पर की जा रही है और मेडिकल सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया कैसे पूरी हो रही है।
बिन डॉक्टर के बन रहे मेडिकल सर्टिफिकेट
पटना डीटीओ में प्रमाणपत्रों की जांच शुरू होने के बाद इसका खुलासा हुआ। जांच में पता चला कि संबंधित चिकित्सकों ने पिछले पांच साल में एक भी मेडिकल प्रमाणपत्र जारी नहीं किया है। ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण (रिन्यू) के लिए मेडिकल प्रमाणपत्र अनिवार्य है। इसके लिए सरकारी अस्पताल के चिकित्सक से प्रमाणपत्र बनवाकर आवेदन के साथ जमा करना होता है। कई वाहन चालक बिना प्रमाणपत्र के ही लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए डीटीओ कार्यालय पहुंच जाते हैं। ऐसे आवेदकों की सुविधा के लिए कार्यालय में ही मेडिकल जांच कर प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था की गई थी।
ड्राइविंग लाइसेंस और परिवहन संबंधी प्रक्रियाओं में मेडिकल सर्टिफिकेट का अहम महत्व होता है। आवेदक की शारीरिक और स्वास्थ्य संबंधी स्थिति की जांच के बाद ही संबंधित प्रमाणपत्र जारी किया जाना अपेक्षित है।
पटना DTO कार्यालय को लेकर सामने आए आरोपों में इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाया गया है। यदि डॉक्टर की निर्धारित समय पर मौजूदगी नहीं होती है, तो मेडिकल सर्टिफिकेट जारी होने की प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मेडिकल सर्टिफिकेट कैसे बन रहा है?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि डॉक्टर की अनुपस्थिति में मेडिकल सर्टिफिकेट तैयार करने की प्रक्रिया किस तरह संचालित हो रही है। क्या किसी अधिकृत चिकित्सक की ओर से बाद में सत्यापन किया जाता है या कार्यालय में कोई अन्य व्यवस्था लागू है, इसकी स्पष्ट जानकारी जांच के बाद ही सामने आ सकती है।
यही वजह है कि मामले में संबंधित अधिकारियों की भूमिका और सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़ी मेडिकल जांच का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वाहन चलाने वाला व्यक्ति निर्धारित स्वास्थ्य मानकों को पूरा करता है। विशेष श्रेणी के लाइसेंस और कुछ आयु वर्ग के आवेदकों के लिए मेडिकल प्रमाणपत्र की आवश्यकता हो सकती है।
ऐसे में मेडिकल सर्टिफिकेट केवल एक औपचारिक दस्तावेज नहीं है। इसके आधार पर आवेदक की पात्रता से जुड़ी प्रक्रिया आगे बढ़ती है। इसलिए इसमें किसी भी तरह की अनियमितता की शिकायत होने पर जांच जरूरी हो जाती है।
रिकॉर्ड की जांच से सामने आ सकती है सच्चाई
मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि किन तारीखों में कितने मेडिकल सर्टिफिकेट जारी किए गए और उन पर किस डॉक्टर के हस्ताक्षर या डिजिटल सत्यापन दर्ज हैं।
इसके अलावा संबंधित डॉक्टर की उपस्थिति का रिकॉर्ड, मेडिकल जांच रजिस्टर और सर्टिफिकेट जारी करने से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड की जांच भी की जा सकती है। इन दस्तावेजों से यह पता लगाया जा सकता है कि मेडिकल प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार पूरी हुई या नहीं।
DTO प्रशासन से जवाब की जरूरत
मेडिकल सर्टिफिकेट को लेकर उठे सवालों के बीच DTO प्रशासन से स्थिति स्पष्ट करने की अपेक्षा है। यदि डॉक्टर की ड्यूटी निर्धारित है तो उनकी उपस्थिति का समय और मेडिकल जांच की व्यवस्था सार्वजनिक रूप से स्पष्ट की जा सकती है।
वहीं, यदि डॉक्टर की अनुपस्थिति में कोई वैकल्पिक व्यवस्था अधिकृत रूप से लागू है, तो उसके नियम और प्रक्रिया की जानकारी भी सामने आनी चाहिए। इससे आवेदकों के बीच किसी तरह का भ्रम नहीं रहेगा।
शिकायत सही साबित हुई तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी
अगर जांच में यह साबित होता है कि बिना उचित मेडिकल जांच के प्रमाणपत्र जारी किए गए, तो संबंधित प्रक्रिया की जिम्मेदारी तय करने का सवाल उठेगा। वहीं, यदि जांच में आरोप सही नहीं पाए जाते हैं और सभी सर्टिफिकेट निर्धारित प्रक्रिया के तहत जारी हुए हैं, तो प्रशासन के स्पष्टीकरण से स्थिति साफ हो सकती है।
फिलहाल पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि पटना DTO कार्यालय में मेडिकल सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया वास्तव में किस तरीके से संचालित हो रही है। दस्तावेजों और आधिकारिक जांच के आधार पर ही इसकी पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।