यूपी की दलित राजनीति में नए समीकरण, मायावती और चंद्रशेखर के बीच बढ़ती सियासी प्रतिस्पर्धा
लखनऊ, 03 अगस्त 2026 । यूपी में 2027 चुनाव के लिए बिसात बिछनी शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख एवं सांसद चंद्रशेखर आजाद के बीच बढ़ती राजनीतिक सक्रियता ने नए समीकरणों को जन्म दिया है। दोनों नेता दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं, जिससे राज्य की राजनीति में नई हलचल देखने को मिल रही है।
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद सदन से लेकर सड़क तक दलितों के मुद्दों को उठाने में लगे हैं। चंद्रशेखर ने यूपी चुनाव के लिए पहली सूची जारी करते हुए 45 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी। जिसमें 18 दलित, 16 ओबीसी (OBC), 10 मुस्लिम और 1 सिख चेहरे को मैदान में उतारा गया है। साफ है कि चंद्रशेखर यूपी में दलित वर्ग को साधने में जुट गया है।
मायावती लंबे समय से उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति का प्रमुख चेहरा रही हैं। उन्होंने बहुजन राजनीति को मजबूत आधार दिया और कई बार प्रदेश की सत्ता तक पहुंचीं। हालांकि, हाल के वर्षों में BSP के चुनावी प्रदर्शन में गिरावट देखने को मिली है। इसके विपरीत, चंद्रशेखर आजाद युवा नेतृत्व और जमीनी आंदोलनों के जरिए अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। वे सामाजिक न्याय, संविधान और दलित अधिकारों जैसे मुद्दों पर लगातार सक्रिय दिखाई देते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल मायावती के पास व्यापक संगठनात्मक ढांचा और वर्षों का राजनीतिक अनुभव है, जबकि चंद्रशेखर आजाद युवाओं और नए मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में दोनों नेताओं की राजनीतिक ताकत अलग-अलग आधारों पर टिकी हुई है। कौन किस पर भारी है, इसका स्पष्ट जवाब चुनावी नतीजों और जनता के समर्थन से ही मिलेगा।
उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस वर्ग का समर्थन हासिल करने की रणनीति बना रहे हैं। आने वाले चुनावों में मायावती और चंद्रशेखर आजाद की राजनीतिक रणनीति, गठबंधन और जनसमर्थन यह तय करेंगे कि दलित राजनीति की दिशा किस ओर जाती है।