अमृतसर, 28 जुलाई 2026 । अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ने गुरुद्वारों में योग गतिविधियों को लेकर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि गुरुद्वारे केवल गुरमत, कीर्तन, अरदास और सिख धार्मिक परंपराओं के पालन के लिए हैं, यहां योग कार्यक्रमों के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कहा कि गुरुद्वारों की धार्मिक मर्यादा (रेहत मर्यादा) का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी ऐसी गतिविधि की अनुमति नहीं दी जा सकती जो इस मर्यादा के अनुरूप न हो।
योग सत्र आयोजित करना उचित नहीं माना जा सकता
ज्ञानी कुलदीप सिंह गरगज ने कहा कि सिख धर्म व्यक्तिगत जीवन में शारीरिक व्यायाम या स्वास्थ्य संबंधी गतिविधियों का विरोध नहीं करता। कोई भी व्यक्ति अपने निजी जीवन में योग या अन्य प्रकार के व्यायाम कर सकता है। हालांकि, गुरुद्वारों का परिसर केवल धार्मिक गतिविधियों, संगत और गुरबानी से जुड़ने के लिए निर्धारित है। इसलिए वहां सांस संबंधी व्यायाम या आधुनिक योग सत्र आयोजित करना उचित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि सिख धर्म की अपनी आध्यात्मिक परंपरा, प्रार्थना पद्धति और जीवन दर्शन है। ऐसे में गुरुद्वारों के परिसर का उपयोग केवल धार्मिक और सामुदायिक सेवाओं से जुड़े कार्यों के लिए ही किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि योग करना या न करना व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है, लेकिन गुरुद्वारों को योग कार्यक्रमों के आयोजन का स्थल नहीं बनाया जाना चाहिए।
यह बयान ऐसे समय आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में सार्वजनिक और धार्मिक स्थलों पर योग कार्यक्रमों को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। इस मुद्दे पर अलग-अलग धार्मिक संगठनों और समुदायों की अपनी-अपनी राय रही है। अकाल तख्त की ओर से दिए गए इस बयान को सिख धार्मिक संस्थाओं के लिए एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि गुरुद्वारों की धार्मिक मर्यादा और परंपराओं का पालन सर्वोपरि रहेगा।
सिख धर्म में योग का क्या मतलब
उन्होंने गुरबानी का उल्लेख करते हुए कहा कि सिख धर्म में योग शब्द का वास्तविक अर्थ परमात्मा से मिलन और आध्यात्मिक जुड़ाव है। इसे आधुनिक समय में प्रचलित शारीरिक योग अभ्यासों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार गुरबानी में वर्णित योग आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है, न कि शारीरिक आसनों का। कार्यवाहक जत्थेदार ने सभी गुरुद्वारा प्रबंधन समितियों से आग्रह किया कि वे यह सुनिश्चित करें कि जिन स्थानों पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब विराजमान हैं, वहां केवल गुरबानी, कीर्तन, अरदास और सिख धार्मिक परंपराओं से जुड़ी गतिविधियां ही आयोजित हों।
फिलहाल इस बयान के बाद धार्मिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, इस विषय पर अलग-अलग पक्षों की अलग-अलग राय है। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय संबंधित धार्मिक संस्थाओं की परंपराओं, नियमों और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के अनुसार लिया जाता है।