राहुल गांधी की कथित दोहरी नागरिकता मामले में सुनवाई टली: जज की टिप्पणी हटाने की मांग पर हाईकोर्ट में अटका केस

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लखनऊ , 28 मई 2026 । कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जुड़े कथित दोहरी नागरिकता विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई फिलहाल टल गई है। मामले में नई कानूनी बहस उस समय शुरू हो गई जब याचिकाकर्ता की ओर से अदालत की पूर्व टिप्पणी हटाने की मांग की गई। इसी मुद्दे पर सहमति न बनने के कारण सुनवाई आगे बढ़ा दी गई।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने कहा कि याचिकाकर्ता ने 20 अप्रैल, 2026 के आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए एक आवेदन दाखिल किया है। इसलिए मुख्य याचिका पर सुनवाई उक्त आवेदन के निस्तारण के बाद ही की जाएगी। कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकर्ता एस. विग्नेश द्वारा दायर एक याचिका पर यह आदेश पारित किया गया।

न्यायमूर्ति विद्यार्थी ने 17 अप्रैल को खुली अदालत में मौखिक रूप से आदेश देते हुए राहुल गांधी के खिलाफ दोहरी नागरिकता के आरोपों के संबंध में प्राथमिकी दर्ज करने और जांच करने का निर्देश दिया था। हालांकि, चैंबर में आदेश पर हस्ताक्षर करने से पूर्व, न्यायाधीश ने महसूस किया कि नोटिस जारी किए बगैर और आरोपी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बगैर कोई प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया जा सकता। इसके परिणाम स्वरूप, इस आदेश पर हस्ताक्षर नहीं किया गया और इस मामले को 20 अप्रैल के लिए सूचीबद्ध किया गया।

मामला राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता और नागरिकता संबंधी दस्तावेजों को लेकर दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का दावा है कि कुछ विदेशी रिकॉर्ड्स में राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर विरोधाभासी जानकारी सामने आई थी, जिसकी जांच जरूरी है। वहीं कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से पहले भी इन आरोपों को राजनीतिक प्रेरित बताया जाता रहा है।

सुनवाई के दौरान अदालत में इस बात पर चर्चा हुई कि पिछली कार्यवाही में की गई कुछ न्यायिक टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाया जाए या नहीं। याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि उन टिप्पणियों का मामले की मुख्य सुनवाई पर असर पड़ सकता है। इसी कानूनी प्रक्रिया में मामला उलझने के बाद अदालत ने अगली तारीख तय कर दी।

हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर काफी दिलचस्पी बनी हुई है। भाजपा नेता पहले भी राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर सवाल उठाते रहे हैं, जबकि कांग्रेस इसे विपक्षी राजनीति का हिस्सा बताती रही है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत में इस तरह की प्रक्रियात्मक मांगें कई बार मुख्य मामले की सुनवाई को प्रभावित करती हैं। यदि अदालत टिप्पणी हटाने की मांग स्वीकार करती है तो आगे की बहस नए तरीके से शुरू हो सकती है।

राजनीतिक हलकों में भी इस मामले को लेकर चर्चा तेज है। विपक्षी दलों का आरोप है कि ऐसे मामलों को चुनावी माहौल में राजनीतिक रूप से उछाला जाता है, जबकि भाजपा का कहना है कि नागरिकता जैसे मामलों में पारदर्शिता जरूरी है।

अब सभी की नजर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां यह तय हो सकता है कि अदालत मामले को किस दिशा में आगे बढ़ाती है।

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