मदनी का बयान: ‘वंदे मातरम’ पर सरकारी आदेश आजादी पर हमला

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नई दिल्ली, 12 फ़रवरी 2026 । जमीयत उलेमा-ए-हिंद से जुड़े मौलाना मदनी ने ‘वंदे मातरम’ को लेकर जारी सरकारी निर्देश पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि किसी भी देशभक्ति गीत या नारे को अनिवार्य बनाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर सवाल खड़ा करता है। उनके अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) और अंतरात्मा की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) का सम्मान होना चाहिए।

मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने वंदे मातरम के सभी छंद गाने का विरोध किया है। संगठन ने कहा कि सरकार का ये आदेश हमारी धार्मिक आजादी पर हमला है।

संगठन ने सरकार के आदेश को एकतरफा और मनमाना बताया। जमीयत के प्रेसिडेंट मौलाना अरशद मदनी ने X पर एक पोस्ट में कहा कि मुसलमान किसी को भी वंदे मातरम गाने या बजाने से नहीं रोकते, लेकिन गाने के कुछ छंद मातृभूमि को एक देवता के रूप में दिखाते हैं। ये हमारी मान्यताओं के खिलाफ हैं।

केंद्र सरकार ने गुरुवार को एक आदेश जारी कर राष्ट्रगीत वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन की तरह ही सम्मान देना अनिवार्य कर दिया है। आदेश के मुताबिक राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड है। अब तक मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे।

सरकारी पक्ष का तर्क है कि ‘वंदे मातरम’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का ऐतिहासिक प्रतीक रहा है और इसे लेकर दिशा-निर्देश राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के उद्देश्य से हैं। वहीं, आलोचकों का कहना है कि देशभक्ति स्वैच्छिक भावना है, इसे बाध्यकारी बनाना उचित नहीं।

कानूनी दृष्टि से, सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के संदर्भ में भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संतुलन आवश्यक है। 1986 के एक प्रमुख फैसले में अदालत ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है लेकिन गाता नहीं, तो उसे दंडित नहीं किया जा सकता—यह उदाहरण अक्सर इस बहस में उद्धृत किया जाता है।

मामला अब राजनीतिक और वैचारिक बहस का रूप ले चुका है। देखना होगा कि क्या इस पर आगे कोई न्यायिक या नीतिगत स्पष्टीकरण आता है, या यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श तक ही सीमित रहता है।

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