हरियाणा , 12 सितंबर 2026। हरियाणा कैडर के 1995 बैच के वरिष्ठ IAS अधिकारी डी. सुरेश के खिलाफ उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक पांच दिन पहले भ्रष्टाचार के एक मामले में FIR दर्ज की गई। मामला गुरुग्राम के सेक्टर-23 स्थित HSVP के 500 वर्ग गज के एक प्लॉट से जुड़ा है। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की FIR में आरोप लगाया गया है कि करीब 3.5 करोड़ रुपये बाजार मूल्य वाली जमीन को महज 6.71 लाख रुपये में बहाल और ट्रांसफर करने की प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन किया गया।
करोड़ों की कीमत वाला प्लॉट बेचा गया माटी मोल
FIR के मुताबिक, HSVP प्लॉट की अनुमानित मार्केट वैल्यू लगभग 3.5 करोड़ रुपये थी, जबकि इसका कलेक्टर रेट लगभग 1.75 करोड़ रुपये था। हालांकि, कथित तौर पर यह प्लॉट सिर्फ़ 6.71 लाख रुपये में ट्रांसफर कर दिया गया।
क्या है गुरुग्राम के प्लॉट का पूरा मामला?
ACB की जांच के मुताबिक विवादित प्लॉट मूल रूप से वर्ष 1988 में आवंटित किया गया था। बकाया भुगतान से जुड़े डिफॉल्ट के बाद HSVP ने वर्ष 2002 में प्लॉट को अपने कब्जे में ले लिया था। इसके बाद करीब सात साल तक चली विजिलेंस जांच में प्लॉट की बहाली और आगे के हस्तांतरण से जुड़े दस्तावेजों की जांच की गई।
आरोप है कि किसी दूसरे प्लॉट की बहाली से जुड़े अदालती आदेश का सहारा लेकर संबंधित प्लॉट के लिए कथित तौर पर फर्जी नोटशीट तैयार की गईं। इसके बाद मार्च 2019 में, जब डी. सुरेश HSVP के चीफ एडमिनिस्ट्रेटर थे, डिफॉल्ट किए गए प्लॉट की जब्ती रद्द करने और आगे की प्रक्रिया को मंजूरी देने का आरोप लगाया गया।
3.5 करोड़ की जमीन 6.71 लाख में देने का आरोप
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल जमीन की कीमत को लेकर है। रिपोर्टों के अनुसार, 500 वर्ग गज के इस प्लॉट की बाजार कीमत करीब 3.5 करोड़ रुपये आंकी गई थी, जबकि कलेक्टर रेट लगभग 1.75 करोड़ रुपये बताया गया। इसके बावजूद इसे करीब 6.71 लाख रुपये में ट्रांसफर किए जाने का आरोप है।
ACB का आरोप है कि इस प्रक्रिया से सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि प्लॉट की बहाली और कन्वेयंस डीड की प्रक्रिया में किन अधिकारियों और अन्य लोगों की भूमिका रही।
FIR में डी. सुरेश समेत कई लोग आरोपी
FIR में डी. सुरेश के अलावा तत्कालीन संपदा अधिकारी मुकेश कुमार समेत अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मामले में कुल नौ लोगों के नाम सामने आए हैं। आरोपों में भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराएं शामिल हैं।
हालांकि, FIR में नाम दर्ज होना आरोप का हिस्सा है और इससे किसी व्यक्ति का अपराध अदालत में साबित नहीं हो जाता। मामले में जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही आरोपों की अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी।
मामले में डी. सुरेश को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से अंतरिम राहत भी मिली है। रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने निर्देश दिया है कि उन्हें हिरासत में लेने से पहले कम से कम सात दिन का नोटिस दिया जाए। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को निर्धारित है।
इस राहत के बाद अब जांच एजेंसी की कार्रवाई और अदालत में मामले की अगली सुनवाई पर नजर रहेगी।
रिटायरमेंट से ठीक पहले क्यों चर्चा में आया मामला?
डी. सुरेश 31 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्त हुए और FIR 26 अगस्त को दर्ज की गई थी। यानी उनके रिटायरमेंट से महज पांच दिन पहले यह कानूनी कार्रवाई हुई। इसी वजह से मामला हरियाणा के प्रशासनिक हलकों में खास चर्चा का विषय बन गया है।
डी. सुरेश ने अपने प्रशासनिक करियर में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। वह HSVP के चीफ एडमिनिस्ट्रेटर समेत सरकार में विभिन्न वरिष्ठ जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। जनवरी 2026 में उन्हें मत्स्य विभाग का प्रधान सचिव नियुक्त किया गया था।
अब जांच में किन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे?
इस पूरे मामले में जांच एजेंसी के सामने कई अहम सवाल हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस प्लॉट को पहले डिफॉल्ट के कारण जब्त किया गया था, उसकी बहाली किस आधार पर की गई। इसके अलावा जमीन की कीमत तय करने, नोटशीट तैयार करने, कन्वेयंस डीड कराने और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच महत्वपूर्ण होगी।
अब जांच और अदालत की कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि प्लॉट की बहाली और ट्रांसफर में वास्तव में नियमों का उल्लंघन हुआ था या नहीं और इसके लिए कौन-कौन लोग जिम्मेदार थे।