पटना, 10 सितंबर2026 । बिहार में साइबर ठगी के एक बड़े मामले की जांच में पुलिस को ऐसा खुलासा हुआ है, जिसने जांच एजेंसियों को भी हैरान कर दिया। करीब 2.5 करोड़ रुपये की ठगी से जुड़े गिरोह के दो कथित मास्टरमाइंड बिहार में ही छिपे हुए थे, लेकिन तकनीकी जांच के दौरान उनकी लोकेशन फ्रांस की दिखाई दे रही थी। पुलिस ने जब मामले की गहराई से पड़ताल की तो विदेशी लोकेशन के पीछे छिपे पूरे खेल का पता चला।
साइबर थाना पुलिस ने आधुनिक सर्विलांस तकनीक का इस्तेमाल कर उनके इस फ्रांसीसी लोकेशन वाले फर्जीवाड़े का पर्दाफाश कर दिया है। फिलहाल दोनों मुख्य आरोपी फरार हैं। जिनकी तलाश में लगातार छापेमारी की जा रही है।
फ्रांस की लोकेशन ने पुलिस को किया गुमराह
जांच के दौरान पुलिस को दोनों संदिग्धों की डिजिटल लोकेशन फ्रांस की मिली। पहली नजर में ऐसा लग रहा था कि ठगी के इस नेटवर्क को विदेश से ऑपरेट किया जा रहा है। लेकिन पुलिस ने तकनीकी साक्ष्यों को दूसरे इनपुट के साथ मिलाकर जांच आगे बढ़ाई तो शक गहराने लगा।
दरअसल, साइबर अपराधी अपनी असली लोकेशन छिपाने के लिए तकनीकी माध्यमों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस मामले में भी पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि डिजिटल लोकेशन और आरोपियों के वास्तविक ठिकाने में अंतर क्यों दिखाई दे रहा है। जांच आगे बढ़ने पर पता चला कि दोनों कथित सरगना बिहार में ही मौजूद थे।
तीन आरोपियों की गिरफ्तारी से खुली मास्टरमाइंड की कड़ी
पुलिस की कार्रवाई में साइबर गिरोह से जुड़े तीन सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद जांच को महत्वपूर्ण सुराग मिले। पूछताछ और तकनीकी जांच के आधार पर पुलिस उन दो लोगों तक पहुंची, जिन्हें इस पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है।
इन आरोपियों पर करीब 2.5 करोड़ रुपये की ठगी से जुड़े होने का आरोप है। जांच में यह भी सामने आया कि पाटलिपुत्र कॉलोनी के एक निवासी से करीब 19 लाख रुपये की ठगी की गई थी। यह मामला सामने आने के बाद पुलिस ने पूरे नेटवर्क की गतिविधियों और पैसों के लेनदेन की जांच तेज कर दी।
डिजिटल फ्रॉड का नेटवर्क कितना बड़ा?
इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि साइबर अपराधी किस तरह तकनीक का इस्तेमाल करके जांच एजेंसियों को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं। आरोपी अपनी वास्तविक पहचान और लोकेशन छिपाकर अलग-अलग जगहों से नेटवर्क संचालित करते हैं।
पटना और बिहार के दूसरे हिस्सों में पहले भी डिजिटल अरेस्ट और दूसरे तरह के साइबर फ्रॉड के मामले सामने आ चुके हैं। सितंबर की शुरुआत में पटना पुलिस ने डिजिटल अरेस्ट के जरिए ठगी करने वाले तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया था। पुलिस के मुताबिक ऐसे गिरोह फर्जी पहचान के जरिए खुद को सरकारी अधिकारी या जांच एजेंसी से जुड़ा बताकर लोगों को डराते थे।
पाटलिपुत्र कॉलोनी के व्यक्ति से हुई करीब 19 लाख रुपये की ठगी ने जांच को महत्वपूर्ण दिशा दी। इतनी बड़ी रकम की ठगी के पीछे कौन लोग हैं और पैसे कहां भेजे गए, इसकी पड़ताल करते हुए पुलिस ने गिरोह के दूसरे सदस्यों तक पहुंच बनाई।
अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि 2.5 करोड़ रुपये की कथित ठगी में कितने लोग शामिल थे, किस-किस खाते का इस्तेमाल किया गया और ठगी की रकम को किस तरीके से इधर-उधर किया गया। इसके साथ ही विदेशी लोकेशन दिखाने की तकनीक के इस्तेमाल की भी जांच की जा रही है।
पुलिस के सामने अब कई बड़े सवाल
दोनों कथित मास्टरमाइंड के बारे में सुराग मिलने के बाद पुलिस के सामने अब कई अहम सवाल हैं। क्या दोनों ने जानबूझकर फ्रांस की लोकेशन दिखाई? क्या इसके लिए किसी खास तकनीकी व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया? क्या इस नेटवर्क के तार बिहार से बाहर या विदेशों में बैठे साइबर अपराधियों से जुड़े हैं?
पुलिस इन सभी पहलुओं पर जांच कर रही है। आरोपियों के डिजिटल डिवाइस, बैंकिंग लेनदेन और संपर्कों की जांच से गिरोह के दूसरे सदस्यों और ठगी के तरीके का पता चलने की उम्मीद है।
साइबर ठगी के बढ़ते मामलों ने बढ़ाई चुनौती
बिहार में साइबर अपराध के मामलों में अपराधियों की तकनीकी दक्षता पुलिस के लिए लगातार चुनौती बन रही है। फर्जी पहचान, डिजिटल अरेस्ट, विदेशी नंबर, ऑनलाइन भुगतान और तकनीकी लोकेशन छिपाने जैसे तरीकों का इस्तेमाल कर ठग लोगों को निशाना बना रहे हैं।
ऐसे मामलों में पुलिस के लिए सिर्फ आरोपी की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होती। पूरे नेटवर्क, बैंक खातों, डिजिटल उपकरणों और पैसे के अंतिम ठिकाने तक पहुंचना भी जरूरी होता है। बिहार के इस मामले में अब जांच का अगला चरण इसी दिशा में आगे बढ़ने की संभावना है।