दिल्ली में खतरनाक इमारतों का खौफ, गिराने से पहले देना पड़ रहा लोहे का सहारा

5 दशक पुरानी बिल्डिंग में पिलर तक नहीं

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नई दिल्ली, 10 सितंबर2026 । दिल्ली के सत्य निकेतन में सामने आई एक जर्जर इमारत की तस्वीर ने राजधानी में पुरानी और कमजोर इमारतों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थिति इतनी खराब है कि इमारत को गिराने से पहले ही MCD को लोहे के मोटे गर्डर लगाकर उसे सहारा देना पड़ा। अधिकारियों को आशंका थी कि तोड़फोड़ के दौरान कंपन से पूरा ढांचा अचानक भरभराकर गिर सकता है और आसपास मौजूद लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है।

MCD के सीनियर अधिकारी के मुताबिक, बुधवार को टीम ने कार्रवाई से पहले पूरी बिल्डिंग का मुआयना किया। सत्य निकेतन की यह बिल्डिंग 5 दशक से ज्यादा पुरानी थी। बेसमेंट और 5 मंजिल की बिल्डिंग दो हिस्सों में बनी थी। करीब 2 दशक बाद पुराने स्ट्रक्चर पर बाकी मंजिलें बनाई गई थीं। 4 इंच की दीवारें खड़ी कर एक-एक मंजिल बनाई गई थी। पिलर भी नहीं था।

पांच दशक पुरानी इमारत, लेकिन पिलर नहीं

सत्य निकेतन में जिस इमारत पर कार्रवाई की जा रही है, वह पांच दशक से ज्यादा पुरानी बताई जा रही है। MCD के निरीक्षण में सामने आया कि इमारत का स्ट्रक्चर बेहद कमजोर था। रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें पिलर तक नहीं था और करीब दो दशक बाद पुराने स्ट्रक्चर के ऊपर अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं। कई हिस्सों में करीब चार इंच मोटी दीवारों के सहारे मंजिलें खड़ी की गई थीं।

इस तरह के निर्माण में समय के साथ जब स्ट्रक्चर कमजोर होता है तो ऊपर का अतिरिक्त भार जोखिम को और बढ़ा सकता है। खासकर पुरानी इमारतों में बिना विशेषज्ञ जांच के किए गए बदलाव गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।

तोड़ने से पहले बिल्डिंग को ही देना पड़ा सपोर्ट

MCD की टीम जब इमारत को गिराने पहुंची तो उसकी हालत देखकर सामान्य तरीके से तोड़फोड़ करना सुरक्षित नहीं माना गया। अधिकारियों को डर था कि हथौड़े या मशीन से होने वाला कंपन कमजोर ढांचे को अचानक गिरा सकता है।

इसी वजह से पहले ग्राउंड फ्लोर और आसपास के हिस्सों में मोटे लोहे के गर्डर और शटरिंग लगाकर स्ट्रक्चर को सपोर्ट दिया गया। बराबर वाली इमारत को भी सहारा दिया गया, क्योंकि दोनों संरचनाएं एक-दूसरे से सटी हुई थीं।

JCB नहीं, 20 मजदूरों से हो रही तोड़फोड़

इमारत की स्थिति इतनी नाजुक है कि MCD ने इसे गिराने के लिए भारी मशीनरी के इस्तेमाल से भी परहेज किया है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 20 मजदूरों की टीम मैनुअल तरीके से इमारत को तोड़ रही है।

मशीन चलाने से पैदा होने वाले कंपन के कारण कमजोर ढांचे के अचानक गिरने का खतरा था। इसलिए ऊपर से धीरे-धीरे तोड़ने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। धूल को नियंत्रित करने के लिए पानी का छिड़काव भी किया जा रहा है।

सत्य निकेतन हादसे के बाद बढ़ी कार्रवाई

सत्य निकेतन में हाल ही में एक पांच मंजिला इमारत गिरने से सात लोगों की मौत हुई थी। हादसे के बाद MCD ने दिल्ली में अवैध और असुरक्षित निर्माण के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। बुधवार को ही निगम ने कई इमारतों पर तोड़फोड़, सीलिंग और नोटिस की कार्रवाई की। रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक 58 इमारतों को गिराया जा चुका है और 31 अन्य के खिलाफ कार्रवाई के आदेश जारी किए गए हैं।

इस कार्रवाई का उद्देश्य केवल अवैध निर्माण हटाना नहीं, बल्कि उन संरचनाओं से संभावित खतरे को कम करना भी है जो कमजोर हो चुकी हैं और लोगों की जान के लिए जोखिम बन सकती हैं।

पुरानी इमारतों को लेकर बढ़ी चिंता

सत्य निकेतन की घटना ने दिल्ली की उन हजारों पुरानी इमारतों पर सवाल खड़ा कर दिया है, जिनमें लंबे समय से लोग रह रहे हैं या व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक केवल इमारत की उम्र से यह तय नहीं किया जा सकता कि वह असुरक्षित है, लेकिन पुरानी संरचनाओं में नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

दरारें, जंग लगा स्टील, पानी का रिसाव, नींव में कमजोरी और बिना अनुमति के अतिरिक्त मंजिलों का निर्माण ऐसे संकेत हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। विशेषज्ञों ने पुराने भवनों में मूल नक्शे और संरचनात्मक स्थिति की जांच कराने पर भी जोर दिया है।

क्या सिर्फ 50 साल पुरानी इमारत गिराना जरूरी है?

किसी इमारत के 50 साल पुराना होने का मतलब अपने आप यह नहीं है कि उसे गिराना अनिवार्य है। लेकिन यदि निरीक्षण में स्ट्रक्चर को खतरनाक पाया जाता है तो संबंधित प्राधिकरण कार्रवाई कर सकता है। दिल्ली में पुरानी इमारतों को लेकर अब यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि उनकी नियमित जांच और समय पर मरम्मत या पुनर्निर्माण की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

सत्य निकेतन की घटना के बाद दिल्ली सरकार ने सार्वजनिक उपयोग वाली इमारतों के लिए नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट और सुरक्षा प्रमाणपत्र की व्यवस्था मजबूत करने की बात कही है। इसका दायरा छात्र आवास जैसी इमारतों तक भी बढ़ाया जा सकता है।

दिल्ली जैसे घनी आबादी वाले शहर में किसी जर्जर इमारत का खतरा सिर्फ उसके अंदर रहने वालों तक सीमित नहीं रहता। आसपास के मकान, सड़क से गुजरने वाले लोग और पड़ोसी संरचनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ पुरानी इमारतों की स्थिति की समय रहते जांच करने और खतरा पाए जाने पर तत्काल कदम उठाने की जरूरत बता रहे हैं।

सत्य निकेतन की यह इमारत फिलहाल MCD की निगरानी में नियंत्रित तरीके से गिराई जा रही है, लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है—क्या दिल्ली की बाकी पुरानी इमारतों की भी समय रहते ऐसी ही जांच हो रही है? आने वाले दिनों में राजधानी में होने वाला सर्वे और निगम की कार्रवाई इस सवाल का जवाब दे सकती है।

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