बिहार में आरक्षण पर सियासत तेज, चिराग पासवान और मांझी पर उठे सवाल

दलित हितों के बजाय राजनीतिक फायदे की लड़ाई का आरोप

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पटना, 31 अगस्त 2026 ।  बिहार में अनुसूचित जाति-जनजाति आरक्षण और उसके भीतर कोटा को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। इसी बीच चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की राजनीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ताजा राजनीतिक विश्लेषण में आरोप लगाया गया है कि दोनों नेता व्यापक दलित समाज के हितों से ज्यादा अपने-अपने राजनीतिक आधार और जातीय समीकरणों को मजबूत करने पर ध्यान दे रहे हैं।

क्या है हालिया बयान छोटे मांझी का?

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा सेक्युलर के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ संतोष सुमन मांझी ने तो ये स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने एससी-एसटी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने या किसी को आरक्षण से बाहर करने की कभी कोई बात नहीं की है। मैंने तो ये कहा था कि उनका असली मुद्दा अनुसूचित जातियों के भीतर अति-वंचित और पिछड़ी जातियों के लिए ‘कोटा के अंदर कोटा’ (सब-वर्गीकरण) लागू करना है। क्रीमी लेयर आरक्षण से वंचित हो ऐसा कभी नहीं कहा। हां, ये जरूर कहा और डंके की चोट पर कहता हूं कि आरक्षण कोटे के अंदर सब कोटा होना चाहिए। ‘क्रीमी लेयर’ और ‘सब-कोटा’ दोनों पूरी तरह से अलग अवधारणाएं हैं। अब रही इस्तीफे की बात तो केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और मैं संतोष कुमार सुमन इस्तीफा दे दूंगा। मगर, हम सेक्युलर तो छोटी पार्टी है और लोजपा(आर) बड़ी पार्टी। पहले चिराग पासवान खुद अपना मंत्री पद छोड़ें, हम भी इस्तीफा देने को तैयार हैं।

विवाद के केंद्र में ‘कोटा के अंदर कोटा’ यानी सब-कैटेगरी और क्रीमी लेयर का मुद्दा है। जीतन राम मांझी के बेटे और HAM(S) के अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने स्पष्ट किया है कि उनकी मांग SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की नहीं, बल्कि अनुसूचित जातियों के भीतर अति-वंचित और पिछड़ी जातियों के लिए सब-कोटा लागू करने की है। उन्होंने यह भी कहा कि क्रीमी लेयर और सब-कोटा अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

दूसरी ओर, चिराग पासवान आरक्षण को लेकर अपने रुख पर मजबूती से कायम हैं। राजनीतिक विश्लेषण में दावा किया गया है कि पासवान समुदाय उनका प्रमुख राजनीतिक आधार है और इसी वजह से सब-कोटा जैसे मुद्दों पर उनका रुख अलग दिखाई देता है। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप और विश्लेषण हैं; संबंधित नेताओं की मंशा पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

बिहार की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा सामाजिक प्रतिनिधित्व, जातीय हिस्सेदारी और राजनीतिक प्रभाव से सीधे जुड़ा है। ऐसे में आने वाले दिनों में चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और अन्य दलित नेताओं के बीच इस मुद्दे पर बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।

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