क्या हम अपराधों का महिमामंडन कर रहे हैं?

जब किसी ऐतिहासिक धरोहर की पहचान उसके गौरव से नहीं, बल्कि एक चर्चित अपराध से जुड़ने लगे, तब हमें रुककर स्वयं से पूछना चाहिए—आख़िर हम समाज के रूप में कहाँ जा रहे हैं?

0

लोहागढ़ किला, ‘सिया पॉइंट’ और हमारी बदलती मानसिकता पर एक गंभीर सवाल

हाल ही में ऐसी खबरें और चर्चाएँ सामने आईं कि महाराष्ट्र के लोहागढ़ किले में आने वाले अनेक पर्यटक अब स्थानीय गाइडों से उस अनौपचारिक स्थान के बारे में पूछ रहे हैं, जिसे सोशल मीडिया पर “सिया पॉइंट” के नाम से प्रचारित किया जा रहा है। चाहे यह रुचि कितनी भी व्यापक या सीमित क्यों न हो, यह प्रवृत्ति अपने आप में एक बड़ा सामाजिक प्रश्न खड़ा करती है।

क्या हम किसी ऐतिहासिक धरोहर को उसके इतिहास, स्थापत्य और सांस्कृतिक महत्व के लिए देखने जा रहे हैं…

या किसी चर्चित अपराध की कहानी से जुड़े रोमांच के लिए?

यह प्रश्न केवल लोहागढ़ का नहीं है।

यह हमारे समय, हमारी सोच और हमारी प्राथमिकताओं का प्रश्न है।

आज सोशल मीडिया पर प्रतिदिन किसी न किसी चर्चित हत्या, आरोपी या उससे जुड़े पात्रों के वीडियो लाखों बार देखे जाते हैं। किसी घटना से जुड़े नाम, चेहरे, स्थान और निजी जीवन पर अंतहीन चर्चाएँ होती हैं। कई बार ऐसा प्रतीत होने लगता है कि अपराध एक सामाजिक त्रासदी नहीं, बल्कि एक मनोरंजन श्रृंखला बन गया है।

क्या हमने कभी सोचा कि हम क्या देख रहे हैं… और उससे भी बड़ा प्रश्न—हम क्या बना रहे हैं?

अपराध की जानकारी और अपराध का महिमामंडन—दोनों अलग बातें हैं

लोकतंत्र में किसी भी अपराध की निष्पक्ष रिपोर्टिंग आवश्यक है। समाज को तथ्य जानने का अधिकार है।

लेकिन जब अपराध से जुड़े व्यक्तियों के नाम, उनके ठिकाने, उनकी निजी कहानियाँ, उनसे जुड़े स्थान और हर छोटी-बड़ी बात लगातार आकर्षण का केंद्र बनने लगे, तब अनजाने में अपराध की गंभीरता पीछे छूट जाती है और उसका “रोमांच” आगे आ जाता है।

यही वह मोड़ है जहाँ समाज को सजग होना चाहिए।


हम सबकी जिम्मेदारी क्या है?

1. व्यक्ति की जिम्मेदारी

हर क्लिक एक संदेश देता है।

हर शेयर किसी विषय को और बड़ा बना देता है।

यदि हम बिना सोचे-समझे सनसनीखेज़ वीडियो देखते, साझा करते और बढ़ावा देते हैं, तो हम भी उस डिजिटल भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं जो अनजाने में अपराध को प्रसिद्धि देती है।

हमें स्वयं से पूछना चाहिए—

क्या मैं सूचना ग्रहण कर रहा हूँ… या सनसनी का उपभोक्ता बन गया हूँ?

2. समाज की जिम्मेदारी

समाज अपने नायकों का चुनाव स्वयं करता है।

यदि हमारे बच्चों को वैज्ञानिकों, सैनिकों, शिक्षकों, खिलाड़ियों और नवाचारकर्ताओं से अधिक अपराधियों के नाम याद हैं, तो यह केवल शिक्षा की नहीं, सामाजिक प्राथमिकताओं की भी विफलता है।

हमें ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जहाँ चर्चा उपलब्धियों की हो, विवादों की नहीं; चरित्र की हो, कुख्याति की नहीं।

3. मीडिया की जिम्मेदारी

मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।

उसका कर्तव्य तथ्यों को सामने लाना है, न कि अपराध को एक अंतहीन मनोरंजन सामग्री में बदल देना।

टीआरपी और क्लिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है समाज की मानसिक दिशा।

हर दिन नए कोण, नए वीडियो, नए विवाद और नई सनसनी प्रस्तुत करना पत्रकारिता नहीं, बल्कि संवेदनाओं का व्यवसाय बन सकता है।

मीडिया जितनी शक्ति रखता है, उतनी ही बड़ी उसकी नैतिक जिम्मेदारी भी है।

4. सरकार और संस्थाओं की जिम्मेदारी

सरकार का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं है।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जिम्मेदार सामग्री को प्रोत्साहित करना, मीडिया साक्षरता बढ़ाना, युवाओं में आलोचनात्मक सोच विकसित करना और विरासत स्थलों की गरिमा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

ऐतिहासिक धरोहरों की पहचान उनके इतिहास से होनी चाहिए, किसी अपराध की स्मृति से नहीं।

सबसे बड़ा प्रश्न—हम कहाँ जा रहे हैं?

हमारे देश में प्रतिदिन विज्ञान, खेल, कृषि, शिक्षा, स्टार्टअप, सेना और समाजसेवा के अनगिनत प्रेरक कार्य होते हैं।

लेकिन क्या उन्हें उतनी ही उत्सुकता से देखा जाता है जितनी किसी चर्चित अपराध से जुड़े वीडियो को?

यदि नहीं…

तो समस्या केवल एल्गोरिद्म की नहीं है।

समस्या हमारी सामूहिक रुचि की भी है।

जिस समाज का ध्यान प्रेरणा से अधिक सनसनी पर टिक जाए…

वहाँ धीरे-धीरे आदर्श बदलने लगते हैं।

और जब आदर्श बदलते हैं…

तो पीढ़ियों की दिशा भी बदल जाती है।

आज आवश्यकता किसी एक व्यक्ति, किसी एक मीडिया संस्थान या किसी एक सरकार को दोष देने की नहीं है।

आवश्यकता सामूहिक आत्ममंथन की है।

क्योंकि समाज वही बनता है जिसे वह बार-बार देखता है, सुनता है और महत्व देता है।

आइए, हम यह तय करें कि हमारी अगली पीढ़ी के आदर्श अपराध से जुड़े नाम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण से जुड़े व्यक्तित्व हों।

जिस दिन हम सनसनी से अधिक सत्य, अपराध से अधिक उपलब्धि और कुख्याति से अधिक चरित्र को महत्व देना शुरू कर देंगे…

उसी दिन सच्चे अर्थों में उजाले की शुरुआत होगी।

— राष्ट्रीय उजाला | उजाले की बात

Leave A Reply

Your email address will not be published.