चार धाम यात्रा को लेकर बड़ा प्रस्ताव, गैर सनातनियों के प्रवेश पर रोक की मांग

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देहरादून, 11 मार्च 2026 । उत्तराखंड में होने वाली प्रसिद्ध Char Dham यात्रा को लेकर एक नया प्रस्ताव चर्चा में आ गया है। देहरादून में आयोजित समिति की बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि चार धाम में गैर सनातनी लोगों के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की जाए। इस फैसले के बाद धार्मिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है।

उत्तराखंड में चार धाम यात्रा 2026 की तैयारियों को पूरा कराया जा रहा है। इसको लेकर सरकार के स्तर पर तैयारियां चल रही है। इस बीच केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में गैर सनातनियों के प्रवेश पर रोक लगाने का रास्ता साफ हो गया है। मंगलवार को देहरादून में श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) की बोर्ड बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। दरअसल, पहले ही मंदिर समिति की ओर से मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक लगाया गया था। इसको लेकर कई प्रकार के सवाल उठ रहे थे। मुस्लिम दुकानदारों को इन धामों के आसपास दुकान लगाने से रोकने का निर्णय आया था। अब बोर्ड की बैठक में इस संबंध में फैसला हुआ है।

बैठक में शामिल संतों और समिति के सदस्यों का कहना था कि चार धाम यात्रा सनातन धर्म की आस्था से जुड़ी बेहद पवित्र धार्मिक परंपरा है। उनका मानना है कि इस तीर्थ यात्रा का उद्देश्य केवल धार्मिक साधना और श्रद्धालुओं की आध्यात्मिक यात्रा है, इसलिए इसकी पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ नियमों पर विचार किया जाना चाहिए।

चार धाम यात्रा में मुख्य रूप से Badrinath Temple, Kedarnath Temple, Gangotri Temple और Yamunotri Temple शामिल हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु इन तीर्थ स्थलों की यात्रा करते हैं। समिति के कुछ सदस्यों का कहना है कि तीर्थ स्थलों की धार्मिक गरिमा को बनाए रखने के लिए यह प्रस्ताव लाया गया है।

मोबाइल पर प्रतिबंध

बीकेटीसी के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा कि चार धाम यात्रा के दौरान बद्रीनाथ धाम और केदारनाथ में एक तय सीमा में मोबाइल पर भी प्रतिबंध रहेगा। बद्रीनाथ में सिंहद्वार से आगे मोबाइल को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव पारित किया गया है। वहीं, केदारनाथ में प्लाजा एवं संपूर्ण परिसर में मोबाइल को प्रतिबंधित करने पर सहमति बनी है।

हालांकि इस प्रस्ताव पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे धार्मिक परंपरा की रक्षा के रूप में देख रहे हैं, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि इस तरह के प्रस्ताव से सामाजिक और कानूनी बहस भी खड़ी हो सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के प्रस्तावों को लागू करने के लिए राज्य सरकार और प्रशासनिक स्तर पर कई कानूनी पहलुओं पर विचार करना जरूरी होगा। फिलहाल यह प्रस्ताव चर्चा का विषय बना हुआ है और आने वाले समय में इस पर आगे की प्रक्रिया तय की जा सकती है।

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