पानीपत, 26 सितंबर 2026 । यमुना नदी में बढ़ते प्रदूषण को लेकर प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों की निगरानी लगातार सख्त हो रही है। औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले बिना उपचारित अपशिष्ट और केमिकलयुक्त पानी को नदी और उससे जुड़े नालों में छोड़े जाने के मामलों में कार्रवाई की तैयारी है। प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था के तहत नियमों का पालन नहीं करने वाली फैक्ट्रियों के खिलाफ नोटिस, पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और जरूरत पड़ने पर बंद करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है।
26 तकनीकी संस्थान करेंगे औचक निरीक्षण
सीपीसीबी ने वर्ष 2026 के अपने वार्षिक निरीक्षण अभियान के तहत देश के 26 प्रमुख तकनीकी संस्थानों को औचक जांच करने के लिए अधिकृत किया है। ये संस्थान उद्योगों की प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों की जमीनी हकीकत परखेंगे।
औद्योगिक शहर पानीपत में करीब 37 हजार छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां संचालित हैं। चूंकि जिले से होकर यमुना नदी गुजरती है, इसलिए इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट और गंदे पानी के नदी तक पहुंचने का बड़ा खतरा हमेशा बना रहता है। इसी जोखिम को ध्यान में रखते हुए सीपीसीबी ने पानीपत समेत अन्य इलाकों के प्रदूषणकारी उद्योगों पर निगरानी और शिकंजा कसने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।
7 दिन में देनी होगी रिपोर्ट
यमुना प्रदूषण से जुड़े औद्योगिक मामलों में संबंधित इकाइयों को निर्धारित समयसीमा के भीतर अपने प्रदूषण नियंत्रण संयंत्रों की स्थिति स्पष्ट करनी होगी। हरियाणा के बड़ही औद्योगिक क्षेत्र में 113 औद्योगिक इकाइयों को एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़े मानकों पर नोटिस जारी किए जाने की रिपोर्ट सामने आ चुकी है। इन इकाइयों से सात दिन के भीतर स्ट्रक्चरल एडिक्वेसी रिपोर्ट जमा करने को कहा गया था। यह मामला ड्रेन नंबर-6 से जुड़ा है, जिसका पानी आगे चलकर यमुना में पहुंचता है।
औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट को सीधे नाले, नदी या जलस्रोत में छोड़ना पर्यावरणीय नियमों के तहत गंभीर उल्लंघन माना जाता है। उद्योगों को अपने एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए अपशिष्ट जल का उपचार करना होता है। नियमों का पालन नहीं होने पर संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कार्रवाई कर सकता है।
केंद्र सरकार के अनुसार CPCB और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों की निगरानी करते हैं। नियमों के उल्लंघन की स्थिति में शो-कॉज नोटिस और क्लोजर डायरेक्शन जैसी कार्रवाई का प्रावधान है।
ऑनलाइन मॉनिटरिंग से भी रखी जा रही नजर
अत्यधिक प्रदूषण की संभावना वाली 17 श्रेणियों के उद्योगों और कॉमन ट्रीटमेंट सुविधाओं के लिए ऑनलाइन कंटीन्यूअस एफ्लुएंट/एमिशन मॉनिटरिंग सिस्टम यानी OCEMS की व्यवस्था की गई है। इसके जरिए प्रदूषण से जुड़े आंकड़े CPCB और संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सर्वर तक पहुंचते हैं।
यदि किसी औद्योगिक इकाई से निकलने वाले प्रदूषक निर्धारित सीमा से ऊपर पाए जाते हैं, तो सिस्टम के जरिए अलर्ट भेजा जा सकता है और संबंधित एजेंसी कार्रवाई कर सकती है।
यमुना की सफाई में सबसे बड़ी चुनौतियों में औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू सीवेज दोनों शामिल हैं। नदी से जुड़े नालों में यदि बिना उपचारित औद्योगिक पानी छोड़ा जाता है तो उसका असर सीधे नदी की जल गुणवत्ता पर पड़ता है।
यमुना बेसिन से जुड़े पुराने मामलों में भी औद्योगिक क्षेत्रों और कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे मामलों में प्रदूषण नियंत्रण मानकों के पालन की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
नियम तोड़ने पर बंद हो सकती है फैक्ट्री
प्रदूषण नियंत्रण नियमों का उल्लंघन साबित होने पर संबंधित इकाई के खिलाफ कार्रवाई कई स्तरों पर हो सकती है। इसमें नोटिस जारी करना, सुधार के लिए समय देना, पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाना और गंभीर या लगातार उल्लंघन की स्थिति में क्लोजर डायरेक्शन शामिल हो सकता है।
इसलिए सात दिन की समयसीमा को केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं माना जा रहा है। जिन इकाइयों की रिपोर्ट संतोषजनक नहीं पाई जाएगी या जिनमें प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था मानकों के अनुरूप नहीं मिलेगी, उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई संबंधित नियामक एजेंसियों के निर्णय पर निर्भर करेगी।
यमुना की सफाई के लिए बढ़ रही निगरानी
यमुना में प्रदूषण कम करने के लिए औद्योगिक इकाइयों के साथ-साथ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, नालों और अन्य प्रदूषण स्रोतों की निगरानी भी जरूरी है। केंद्र सरकार के अनुसार प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को औद्योगिक इकाइयों की नियमित जांच करने और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
ऐसे में आने वाले दिनों में उन फैक्ट्रियों पर कार्रवाई बढ़ सकती है, जहां से बिना उपचारित औद्योगिक अपशिष्ट जल निकलने की शिकायत या जांच में पुष्टि होती है।