पटना, 28 अगस्त 2026 । बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण और आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर चुनावी बहस के केंद्र में आ गया है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर अपने-अपने राजनीतिक रुख के जरिए चर्चा में हैं। दोनों नेताओं की राजनीति का आधार अलग-अलग सामाजिक समूहों से जुड़ा है, लेकिन आरक्षण का सवाल बिहार में व्यापक राजनीतिक प्रभाव रखता है।
इनके इस बौद्धिक जुगाली में जातीय राजनीति के नामवर बने रहने की जंग वैसे ही है जो प्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा द्वारा लिखी गई एक व्यंग्यात्मक और प्रसिद्ध हिंदी कहानी ‘दो बांके’ में उन ‘दो बांकों’ की है, जो अपना अपना सिक्का जमाए और घर लौट गए। अब जानिए कि ये दो कद्दावर नेता क्या कह गए।
आरक्षण बना सियासी बहस का बड़ा मुद्दा
बिहार में चुनावी राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। आरक्षण को लेकर होने वाली बहस भी इसी सामाजिक और राजनीतिक समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बयानों ने इस बहस को और धार दी है।
चिराग पासवान का अपना राजनीतिक आधार
चिराग पासवान बिहार में दलित राजनीति के प्रमुख युवा चेहरों में शामिल हैं। उनकी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का आधार मुख्य रूप से पासवान समुदाय से जुड़ा माना जाता है। आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे उनके राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
मांझी भी आरक्षण के मुद्दे पर सक्रिय
पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी दलित राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के जरिए वह महादलित वर्ग से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। आरक्षण की व्यवस्था और उसके लाभ को लेकर उनका रुख बिहार की सामाजिक राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है।
NDA के भीतर भी अलग-अलग आवाजें
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का हिस्सा हैं। ऐसे में आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उनके अलग-अलग बयानों का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है। हालांकि, दोनों नेताओं की अंतिम राजनीतिक दिशा गठबंधन की व्यापक रणनीति के साथ किस तरह तालमेल बैठाती है, यह चुनावी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
2027 से पहले जातीय समीकरण अहम
बिहार की राजनीति में जातीय जनगणना, आरक्षण, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण बने रह सकते हैं। राजनीतिक दल अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की सक्रियता को भी इसी व्यापक जातीय और सामाजिक राजनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।
आरक्षण पर जारी बहस केवल नीतिगत सवाल नहीं है, बल्कि बिहार में चुनावी राजनीति और सामाजिक समीकरणों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। आने वाले समय में इन मुद्दों पर नेताओं के बयान और पार्टियों की रणनीति राज्य की सियासत को प्रभावित कर सकती है।