RTI से बाहर रहेगा राजीव गांधी फाउंडेशन, दिल्ली हाई कोर्ट का अहम फैसला

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नई दिल्ली, 18 अगस्त 2026 । दिल्ली हाई कोर्ट ने राजीव गांधी फाउंडेशन को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के दायरे में लाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत के इस फैसले के बाद फाउंडेशन से जुड़ी सूचनाओं को RTI के तहत उपलब्ध कराने की मांग पर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है। याचिका में फाउंडेशन को RTI कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित करने की मांग की गई थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

CIC ने 2010 में क्या कहा था

CIC ने अक्टूबर 2010 में कहा था कि RGF RTI Act की धारा 2(h) के तहत पब्लिक अथॉरिटी नहीं है। आयोग के मुताबिक फाउंडेशन न तो सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण में था और न ही उसे सरकार से इतनी वित्तीय मदद मिली थी कि उसे ‘substantially financed’ माना जाए। आयोग के रिकॉर्ड में सरकारी फंडिंग का हिस्सा औसतन 4 फीसदी से कम बताया गया था।

हाई कोर्ट में मामला लंबे समय से लंबित था

पात्रो की याचिका दिल्ली हाई कोर्ट में 2011 से लंबित थी। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक यह मामला W.P.(C) 2829/2011 के रूप में दर्ज है और कई वर्षों तक अलग-अलग तारीखों पर सूचीबद्ध होता रहा। 2025 की हाई कोर्ट की कारण सूची में भी यह मामला दर्ज था।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने RTI अधिनियम के प्रावधानों और संस्था की कानूनी स्थिति पर विचार किया। RTI कानून के तहत किसी संस्था को सार्वजनिक प्राधिकरण के दायरे में लाने के लिए यह देखना जरूरी होता है कि वह सरकार के स्वामित्व, नियंत्रण या पर्याप्त सरकारी वित्तपोषण के अधीन आती है या नहीं। अदालत के फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इससे गैर-सरकारी संस्थाओं और सार्वजनिक प्राधिकरणों के बीच RTI कानून के तहत लागू होने वाली सीमाओं को समझने में मदद मिलती है।

राजीव गांधी फाउंडेशन लंबे समय से सामाजिक, शैक्षणिक और अन्य सार्वजनिक गतिविधियों से जुड़ा संगठन रहा है। संस्था को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे हैं। ऐसे में RTI के दायरे से जुड़े इस मामले पर अदालत का फैसला कानूनी और राजनीतिक दोनों दृष्टि से चर्चा का विषय बन गया है।

हाई कोर्ट के निर्णय के बाद यह स्पष्ट है कि केवल किसी संस्था की सार्वजनिक गतिविधियों या सामाजिक महत्व के आधार पर उसे स्वतः RTI अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना जा सकता। इसके लिए कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा करना आवश्यक है। अदालत का यह रुख RTI कानून के तहत पारदर्शिता और सार्वजनिक प्राधिकरण की कानूनी परिभाषा के बीच संतुलन को भी रेखांकित करता है।

इस फैसले के बाद राजीव गांधी फाउंडेशन को लेकर RTI के जरिए जानकारी हासिल करने की कोशिश करने वालों के लिए कानूनी स्थिति महत्वपूर्ण हो गई है। वहीं, यह फैसला भविष्य में उन अन्य गैर-सरकारी संस्थाओं से जुड़े मामलों के लिए भी संदर्भ बन सकता है, जिन्हें सरकारी सहायता, वित्तपोषण या गतिविधियों के आधार पर RTI के दायरे में लाने की मांग की जाती है।

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