नाबालिग को भगाने के मामलों पर अदालत सख्त: आरोपी को जमानत देने से इनकार, कानून का स्पष्ट संदेश

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नई दिल्ली, 17 जून्‌ 2026 । राजधानी दिल्ली की एक अदालत ने 25 साल के उस व्यक्ति की जमानत अर्जी खारिज कर दी है, जिस पर दिल्ली से 13 साल की लड़की को अगवा करने, उसे सूरत ले जाने और फिर जबरदस्ती शादी करने का आरोप है। अदालत ने इसे लेकर आरोपी पक्ष को दो टूक में कानून समझा दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने नाबालिग लड़की को भगाने के आरोपी व्यक्ति की जमानत याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में कानून की भावना और पीड़िता के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

जमानत नहीं मिलने की वजह

एडिशनल सेशंस जज हरगुरवरिंदर सिंह जग्गी ने कहा कि ऐसे गंभीर अपराधों में नाबालिग की सहमति की कोई कानूनी अहमियत या वैधता नहीं होती है। इसलिए इस मामले में फिलहाल कोई जमानत नहीं मिलेगी। बता दें कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम ( PCMA ), 2006 और भारतीय न्याय संहिता ( BNS ) के अंतर्गत गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होते हैं। कानूनन, विवाह के लिए लड़की की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष होनी चाहिए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि पीड़िता की आयु कानूनी रूप से नाबालिग है, तो उसकी सहमति को वैधानिक मान्यता नहीं दी जा सकती। ऐसे मामलों में आरोपी यह तर्क नहीं दे सकता कि लड़की अपनी इच्छा से उसके साथ गई थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून नाबालिगों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान करता है और उनका कड़ाई से पालन किया जाना आवश्यक है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की गंभीरता, पीड़िता की आयु और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। ऐसे में आरोपी को जमानत देने से जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसी आधार पर जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में भारतीय कानून बेहद स्पष्ट है। यदि किसी नाबालिग लड़की को उसके अभिभावकों की अनुमति के बिना ले जाया जाता है या उसके साथ किसी प्रकार का अनुचित संबंध स्थापित किया जाता है, तो यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में अदालतें आमतौर पर पीड़िता की सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्राथमिकता देती हैं।

अदालत की यह टिप्पणी एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखी जा रही है कि नाबालिगों से जुड़े अपराधों में कानून किसी भी प्रकार की ढिलाई बरतने के पक्ष में नहीं है। न्यायपालिका का यह रुख बच्चों और किशोरियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा समाज में कानूनी जागरूकता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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