महाराष्ट्र में मुस्लिमों के 5% आरक्षण का आदेश रद्द: कानूनी और राजनीतिक बहस तेज

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मुंबई, 18 फ़रवरी 2026 । महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय को दिए गए 5% आरक्षण से जुड़े आदेश को रद्द किए जाने के बाद राज्य की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। यह फैसला सामाजिक न्याय, संवैधानिक प्रावधानों और आरक्षण नीति की सीमाओं को लेकर नई बहस छेड़ रहा है।

मुस्लिम समुदाय के लिए प्रस्तावित 5% आरक्षण को पहले सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर लागू करने की कोशिश की गई थी। हालांकि इस पर कानूनी चुनौतियां सामने आईं। अदालत में दायर याचिकाओं में तर्क दिया गया कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के मूल ढांचे के अनुरूप नहीं है।

महाराष्ट्र सरकार के सोशल जस्टिस डिपार्टमेंट ने मंगलवार को एक सरकारी रेजोल्यूशन (GR) जारी किया। इसके जरिए सरकार ने अपने 10 साल पुराने उस सरकारी आदेश को कैंसिल कर दिया। जिसमें मुस्लिम कम्युनिटी को एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन और सरकारी और सेमी-गवर्नमेंट नौकरियों में 5% रिजर्वेशन देने की बात कही गई थी।

हालांकि पिछले 10 सालों से यह आदेश इनवैलिड रहा है क्योंकि 2014 में कांग्रेस सरकार की तरफ से लाया गया अध्यादेश तय समय (6 हफ्ते) में विधानसभा से पास नहीं कराया जा सका, जिससे यह खुद ही इनवैलिड हो गया था।

जुलाई 2014 में कांग्रेस-एनसीपी की गठबंधन की सरकार थी। अक्टूबर 2014 में सरकार बदल गई। विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा-शिवसेना सरकार बनी। नई सरकार ने नौकरी वाले मुस्लिम आरक्षण को आगे नहीं बढ़ाया।

इस संदर्भ में बॉम्बे हाई कोर्ट और पहले के कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया जाता रहा है, जहां आरक्षण नीति को सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के ठोस आंकड़ों से जोड़ने पर जोर दिया गया था।

सरकार की ओर से कहा गया था कि समुदाय के कुछ वर्ग सामाजिक रूप से पिछड़े हैं और उन्हें शिक्षा व रोजगार में अवसर देने की आवश्यकता है। वहीं विरोधियों का मत है कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक मानदंड होना चाहिए।

राजनीतिक दलों ने इस फैसले पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं। कुछ दल इसे संवैधानिक मूल्यों की जीत बता रहे हैं, तो कुछ इसे सामाजिक न्याय के खिलाफ कदम करार दे रहे हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा राज्य की राजनीति में प्रमुख चुनावी मुद्दा बन सकता है।

कुल मिलाकर, 5% आरक्षण आदेश रद्द होने के बाद अब राज्य सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए वैकल्पिक और संवैधानिक रूप से मजबूत नीति कैसे तैयार करे।

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