नई दिल्ली, 23 अक्टूबर 2026| भारत में न्यायिक प्रक्रिया में देरी और विचाराधीन कैदियों की लंबी हिरासत का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी को मुकदमे की सुनवाई पूरी हुए बिना अनिश्चितकाल तक जेल में रखना उचित नहीं माना जा सकता। हालांकि, जमानत का फैसला प्रत्येक मामले के तथ्यों और कानूनी परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।
29 सितंबर 2026 को संजय बडाया बनाम राजस्थान राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक अपराध से जुड़े आरोपियों को जमानत दी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने मामले में जांच पूरी होने, साक्ष्यों के सुरक्षित होने और मुकदमे के लंबे समय तक चलने की संभावना जैसे पहलुओं पर विचार किया। अदालत ने कहा कि मुकदमे से पहले की हिरासत को सजा का रूप नहीं दिया जा सकता।
संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण देता है। इसमें निष्पक्ष और समयबद्ध सुनवाई का अधिकार भी शामिल है। अदालतों ने कई मामलों में माना है कि यदि मुकदमे का जल्द पूरा होना संभव नहीं दिखता और आरोपी लंबे समय से हिरासत में है, तो जमानत पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर आरोपी को केवल देरी के आधार पर जमानत मिल जाएगी। अपराध की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य, गवाहों को प्रभावित करने की आशंका और अन्य कानूनी प्रतिबंध भी महत्वपूर्ण होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का व्यापक संदेश स्पष्ट है: न्याय व्यवस्था में तेजी और निष्पक्षता दोनों जरूरी हैं। किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप गंभीर हो सकते हैं, लेकिन मुकदमे का समय पर पूरा होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
लंबे समय तक विचाराधीन हिरासत का समाधान बेहतर न्यायिक प्रबंधन, समयबद्ध सुनवाई और जमानत आवेदनों पर शीघ्र निर्णय से ही संभव है।