नई दिल्ली, 09 अक्टूबर 2026 । दिल्ली में 20 जुलाई को हुए ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान भड़की हिंसा का मामला एक बार फिर चर्चा में है। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इस घटना की जांच के लिए नई प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है। अब जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि हिंसा अचानक भड़की थी या इसके पीछे पहले से कोई योजना बनाई गई थी। पुलिस का ध्यान प्रदर्शन के दौरान हुई तोड़फोड़, पुलिसकर्मियों पर कथित हमलों और भीड़ को उकसाने में शामिल लोगों की भूमिका पर रहेगा।
इस बात का पता लगा रही पुलिस
पुलिस अब यह भी पता लगाएगी कि क्या भीड़ में क्रिमिनल्स भी दाखिल हुए थे? क्या यह हिंसा एक सुनियोजित साजिश थी? पुलिस सूत्रों के मुताबिक, प्रदर्शन में शामिल कुछ अराजक तत्वों ने पुलिस वालों पर हमला किया, तोड़फोड़ की और पुलिस की गाड़ियों समेत अन्य पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाया था।
क्राइम ब्रांच किन पहलुओं की करेगी जांच?
जांच में यह पता लगाया जाएगा कि हिंसा के दौरान किन लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई और क्या किसी ने प्रदर्शनकारियों को उकसाया था। इसके साथ ही पुलिस कथित आपराधिक साजिश, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिसकर्मियों पर हमले से जुड़े पहलुओं की पड़ताल करेगी।
पुलिस यह भी जांच कर रही है कि प्रदर्शन से पहले सोशल मीडिया समूहों या अन्य माध्यमों के जरिए लोगों को जुटाने की कोई योजना बनाई गई थी या नहीं। हालांकि, जांच पूरी होने से पहले हिंसा के पीछे किसी व्यक्ति या संगठन की भूमिका को अंतिम रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
2,873 लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में
इस मामले में 2,873 ऐसे लोगों की पहचान का मुद्दा भी सामने आया है, जिनके आपराधिक रिकॉर्ड होने की बात पुलिस ने कही थी। अधिकारियों के अनुसार, इन लोगों की पहचान प्रदर्शन स्थल पर इस्तेमाल किए गए फेस रिकग्निशन सिस्टम के जरिए की गई थी।
अब क्राइम ब्रांच यह सत्यापित करेगी कि ये सभी लोग वास्तव में 20 जुलाई को प्रदर्शन स्थल पर मौजूद थे या नहीं। उनकी पृष्ठभूमि, प्रदर्शन से संभावित संबंध और हिंसा में किसी तरह की भूमिका की भी जांच की जाएगी।
इस प्रक्रिया में पहचान संबंधी रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों का मिलान महत्वपूर्ण होगा। केवल किसी व्यक्ति का नाम सूची में होना अपने आप में हिंसा में उसकी संलिप्तता साबित नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज हुई नई FIR
नई FIR दर्ज करने की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के आदेश के बाद हुई है। अदालत ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पहले दर्ज मामलों को निरस्त करते हुए 2,873 कथित आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के संबंध में नई FIR दर्ज करने की अनुमति दी थी।
इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच के लिए नया कानूनी कदम उठाया है। अब जांच एजेंसी को संबंधित लोगों की मौजूदगी, उनकी वास्तविक भूमिका और उपलब्ध सबूतों की अलग-अलग पुष्टि करनी होगी।
20 जुलाई को कैसे बिगड़े थे हालात?
20 जुलाई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के आह्वान पर प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च कर रहे थे। मार्च के दौरान कुछ स्थानों पर हालात तनावपूर्ण हो गए और बैरिकेडिंग पार करने की कोशिशों के बीच प्रदर्शनकारियों तथा सुरक्षा बलों के बीच टकराव हुआ।
पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया था। घटना के दौरान पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के घायल होने की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद हिंसा, कथित मारपीट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़े मामलों की जांच शुरू हुई।
वीडियो और डिजिटल सबूतों की होगी पड़ताल
जांच के दौरान पुलिस CCTV फुटेज, ड्रोन से रिकॉर्ड किए गए वीडियो, बॉडी कैमरों की रिकॉर्डिंग और डिजिटल साक्ष्यों की मदद ले सकती है। इन सबूतों से घटनाक्रम को जोड़ने और अलग-अलग व्यक्तियों की भूमिका का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
क्राइम ब्रांच के सामने अहम सवाल यह है कि हिंसा की शुरुआत कैसे हुई, क्या कुछ लोगों ने जानबूझकर हालात बिगाड़े और क्या इसके पीछे कोई संगठित योजना थी। इन सवालों के जवाब जांच के निष्कर्षों और पुष्ट साक्ष्यों के आधार पर ही सामने आएंगे।
नई FIR दर्ज होने के बाद 20 जुलाई की हिंसा की जांच एक नए चरण में पहुंच गई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस की जांच में कथित साजिश, हिंसा भड़काने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं।
फिलहाल, किसी व्यक्ति की भूमिका और जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच तथा कानूनी प्रक्रिया के बाद ही किया जा सकेगा।