जर्मनी , 09 सितंबर2026 । जर्मनी की राजनीति में दक्षिणपंथी राजनीति के लिए बड़ा मोड़ सामने आया है। Alternative for Germany (AfD) ने सैक्सोनी-आनहाल्ट के राज्य चुनाव में करीब 44 फीसदी वोट हासिल कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। यह नतीजा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में किसी कट्टर दक्षिणपंथी दल के लिए सबसे बड़ी चुनावी सफलताओं में से एक है।
AfD दूसरे देशों से आकर जर्मनी में बसे लोगों और समलैंगिक शादी के खिलाफ सख्त रुख के लिए जानी जाती है। लेकिन इस पार्टी की कहानी में एक बात सबसे ज्यादा चौंकाती है।
AfD की चीफ एलिस वीडल खुद लेस्बियन हैं। उनकी पार्टनर श्रीलंका में जन्मी हैं। यानी जिस पार्टी की नीतियां समलैंगिक शादी और प्रवासियों के खिलाफ हैं, उसी पार्टी की सबसे ताकतवर नेता की निजी जिंदगी इससे बिल्कुल अलग है।
जर्मनी में AfD के बढ़ते प्रभाव के पीछे वीडल का बड़ा हाथ माना जाता है। उनकी राजनीति को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर एलिस वीडल कौन हैं और वह ऐसी पार्टी का चेहरा कैसे बनीं, जिसकी सोच उनकी अपनी जिंदगी से बिल्कुल अलग है?
पहली बार सत्ता के बेहद करीब AfD
AfD की इस जीत का सबसे बड़ा महत्व यह है कि पार्टी अब जर्मनी के किसी राज्य में सरकार बनाने की स्थिति के बेहद करीब पहुंच गई है। पार्टी ने 83 सदस्यीय विधानसभा में 39 सीटें जीती हैं, लेकिन पूर्ण बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े से वह पीछे रह गई। ऐसे में सरकार गठन के लिए उसे किसी दूसरी पार्टी के समर्थन की जरूरत होगी।
मुख्यधारा की जर्मन पार्टियां अब तक AfD के साथ गठबंधन से दूरी बनाए रखने की नीति अपनाती रही हैं। इस राजनीतिक ‘फायरवॉल’ के बावजूद AfD का इतना मजबूत प्रदर्शन जर्मनी के पारंपरिक राजनीतिक समीकरण के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
चुनाव में AfD की सफलता के पीछे मतदाताओं की आर्थिक और राजनीतिक नाराजगी को महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। महंगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, ऊर्जा कीमतों और रोजगार से जुड़े मुद्दों ने सरकार के प्रति असंतोष बढ़ाया है।
रिपोर्टों के मुताबिक सैक्सोनी-आनहाल्ट में बड़ी संख्या में मतदाता चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की सरकार के कामकाज से असंतुष्ट हैं। एक सर्वे में 87 फीसदी मतदाताओं ने राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर असंतोष जताया था।
प्रवासन नीति पर AfD का जोर
AfD लंबे समय से जर्मनी की प्रवासन और शरणार्थी नीतियों को लेकर कड़ा रुख अपनाती रही है। पार्टी अवैध प्रवासन पर सख्त कार्रवाई, आव्रजन नियमों में बदलाव और निर्वासन की नीति को प्रमुख मुद्दा बनाती रही है।
चुनाव में भी इन मुद्दों ने पार्टी के अभियान में अहम भूमिका निभाई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी AfD की जीत पर प्रतिक्रिया देते हुए जर्मनी की आव्रजन नीतियों को इसके पीछे एक कारण बताया।
मर्ज की CDU को लगा बड़ा झटका
AfD की शानदार जीत का सीधा असर जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की CDU पर पड़ा है। सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए यह परिणाम बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
मर्ज ने हालांकि चुनावी नतीजों के बाद आर्थिक सुधारों की अपनी योजनाओं से पीछे हटने के संकेत नहीं दिए हैं। उनका कहना है कि जर्मनी की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी सुधारों को आगे बढ़ाना होगा।
क्या AfD सरकार बना पाएगी?
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या AfD सैक्सोनी-आनहाल्ट में अपनी पहली राज्य सरकार बना पाएगी। पार्टी के पास सबसे ज्यादा सीटें जरूर हैं, लेकिन बहुमत नहीं है। उसे सरकार बनाने के लिए किसी अन्य दल का समर्थन हासिल करना होगा।
छोटी वामपंथी पार्टी BSW के विधानसभा में पहुंचने के बाद राजनीतिक समीकरण और दिलचस्प हो गया है। दोनों दल कई मुद्दों पर अलग हैं, लेकिन आव्रजन और यूक्रेन युद्ध जैसे कुछ विषयों पर उनकी सोच में समानताएं भी हैं।
जर्मनी की राजनीति पर दूरगामी असर
AfD की यह जीत सिर्फ एक राज्य के चुनाव तक सीमित नहीं मानी जा रही। इसका असर जर्मनी की राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। पार्टी पहले ही देश के कई हिस्सों में मजबूत जनाधार बना चुकी है और अब राज्य स्तर पर सत्ता के करीब पहुंचना उसके लिए बड़ा राजनीतिक पड़ाव है।
आने वाले समय में बर्लिन और मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया जैसे राज्यों में होने वाले चुनावों पर भी इस नतीजे का असर देखने को मिल सकता है। AfD के बढ़ते प्रभाव ने मुख्यधारा की पार्टियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
यूरोप के लिए भी अहम संकेत
जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसकी राजनीति का असर पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ता है। ऐसे में AfD की ऐतिहासिक सफलता को यूरोप में दक्षिणपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
अब निगाहें इस बात पर होंगी कि AfD राज्य सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाती है या नहीं। फिलहाल इतना साफ है कि सैक्सोनी-आनहाल्ट के चुनाव परिणाम ने जर्मनी की पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था को बड़ा झटका दिया है और AfD को पहली बार राज्य स्तर पर सत्ता के बेहद करीब ला दिया है।