पटना, 08 सितंबर2026 । पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार जीत दर्ज करते आ रहे बीजेपी एमएलसी नवल किशोर यादव के सामने इस बार मुकाबला पहले के मुकाबले ज्यादा चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। यादव इस सीट पर 1996 से लगातार जीतते आए हैं और 2020 में भी उन्होंने अपनी जीत बरकरार रखी थी। अब आगामी चुनाव में उनके सामने विपक्षी दलों के साथ-साथ जन सुराज के रूप में एक नया राजनीतिक विकल्प भी चुनौती पेश कर रहा है।
सातवां वेतन आयोग रिवीजन मसला
बिहार के शिक्षकों में सातवें वेतन आयोग का लाभ नहीं मिलने से काफी नाराजगी है। इस कारण उन्हें काफी वित्तीय नुकसान झेलना पड़ रहा है। इस कारण राज्यकर्मी का दर्जा मिलने के बावजूद वे सातवें वेतन आयोग का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। ऐसे शिक्षकों का कहना है कि चपरासी से लेकर अन्य प्रशासनिक कर्मचारियों को सातवें वेतनमान का लाभ मिल रहा है, जबकि नौनिहालों का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षकों को इससे वंचित रखा गया है।
पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में नवल किशोर यादव का राजनीतिक प्रभाव करीब तीन दशक से बना हुआ है। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक उन्होंने 1996, 2002, 2008, 2014 और 2020 के चुनावों में लगातार जीत दर्ज की। इसी वजह से इस सीट को उनके लिए मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता है।
लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ बदली हुई नजर आ रही हैं। चुनावी मैदान में पुराने प्रतिद्वंद्वियों के अलावा नए राजनीतिक समीकरण भी बन रहे हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या नवल किशोर यादव अपने सियासी ‘छक्के’ को आगे बढ़ा पाएंगे या इस बार बाउंड्री लाइन पर उनका विकेट गिर सकता है।
शिक्षकों की नाराजगी बन सकती है बड़ा मुद्दा
इस चुनाव में शिक्षकों से जुड़े मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। खास तौर पर सातवें वेतन आयोग के रिवीजन का मुद्दा शिक्षक मतदाताओं के बीच चर्चा में है। रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षकों के एक वर्ग में इस मसले को लेकर नाराजगी है, जिसे विपक्षी दल बीजेपी के खिलाफ चुनावी मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं।
यही वजह है कि लंबे समय से मजबूत पकड़ रखने वाले नवल किशोर यादव के सामने इस बार केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि शिक्षक मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने की चुनौती भी है।
राष्ट्रीय जनता दल इस बार पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र को गंभीरता से ले रहा है। पार्टी ने पूर्व विधायक डॉ. संजीव को काफी पहले से चुनाव की तैयारी में लगाया है। ऐसे में मुकाबला अंतिम समय में उम्मीदवार उतारने की रणनीति के बजाय पहले से तैयार राजनीतिक लड़ाई का रूप ले सकता है।
पिछले चुनाव में आरजेडी उम्मीदवार नारायण यादव को 1,923 वोट मिले थे, जबकि नवल किशोर यादव को 3,176 मत हासिल हुए थे। इस बार आरजेडी पहले से तैयारी कर रही है, इसलिए बीजेपी उम्मीदवार के लिए चुनौती बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
जन सुराज की एंट्री से बदलेगा गणित?
पटना शिक्षक सीट के समीकरण में जन सुराज की एंट्री भी अहम मानी जा रही है। प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाला जन सुराज बिहार की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुका है। हालांकि पटना शिक्षक सीट के लिए उम्मीदवार को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने के बावजूद संगठन की सक्रियता ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।
जन सुराज अगर मजबूत उम्मीदवार उतारता है तो वह बीजेपी और आरजेडी दोनों के पारंपरिक वोट समीकरण को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि नवल किशोर यादव के सामने इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना पर भी नजर बनी हुई है।
क्या टूटेगा 30 साल पुराना किला?
नवल किशोर यादव का पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लंबा राजनीतिक रिकॉर्ड है, लेकिन हर चुनाव में पुराने समीकरणों का कायम रहना जरूरी नहीं होता। नए मतदाता, शिक्षक समुदाय के मुद्दे, आरजेडी की सक्रियता और जन सुराज की संभावित चुनौती इस बार चुनाव को अलग बना रही है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी एमएलसी नवल किशोर यादव एक बार फिर अपने अनुभव और संगठनात्मक पकड़ के दम पर जीत दर्ज कर पाएंगे, या इस बार विपक्षी रणनीति उनके करीब तीन दशक पुराने राजनीतिक किले में सेंध लगाने में सफल होगी। चुनावी मुकाबला आगे बढ़ने के साथ यह तस्वीर और साफ होगी।