मुजफ्फरनगर दंगे की बरसी पर पोस्टरों से गरमाई सियासत
हाउस अरेस्ट से सांसद के निकलने पर भी गिरी गाज; 14 पुलिसकर्मी निलंबित
मुजफ्फरनगर , 08 सितंबर2026 । मुजफ्फरनगर दंगे की 13वीं बरसी पर एक बार फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सियासी माहौल गरमा गया है। दंगों की बरसी पर शहर में विवादित पोस्टर लगाए जाने और समाजवादी पार्टी के सांसद हरेंद्र मलिक के हाउस अरेस्ट के बावजूद सहारनपुर पहुंचने के मामले में पुलिस प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। दोनों घटनाओं में ड्यूटी में लापरवाही सामने आने के बाद कुल 14 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है। इनमें पांच दारोगा भी शामिल हैं।
दरअसल, मुजफ्फरनगर दंगे की बरसी के मौके पर शहर के रोडवेज बस स्टैंड समेत कई प्रमुख स्थानों पर अखिलेश यादव की तस्वीर वाले पोस्टर लगाए गए थे। इन पोस्टरों पर ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ जैसे संदेश लिखे गए थे। पोस्टर सामने आने के बाद पुलिस-प्रशासन में हड़कंप मच गया और तत्काल उन्हें हटवाया गया। पुलिस ने पोस्टर लगाने वालों की पहचान के लिए सीसीटीवी फुटेज की जांच शुरू कर दी है।
दूसरी ओर, सहारनपुर में मस्जिद ध्वस्तीकरण के मामले को लेकर सपा प्रतिनिधिमंडल के कार्यक्रम को देखते हुए कई नेताओं को हाउस अरेस्ट किया गया था। सपा सांसद हरेंद्र मलिक को भी मुजफ्फरनगर स्थित उनके आवास पर पुलिस निगरानी में रखा गया था। इसके बावजूद वह पुलिस को चकमा देकर सहारनपुर पहुंच गए। वहां उन्होंने ध्वस्त मस्जिद स्थल का निरीक्षण किया और अधिकारियों से मुलाकात की। इस घटनाक्रम के बाद पुलिस की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठे।
सांसद के हाउस अरेस्ट से बाहर निकलने के मामले में ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच की गई। वहीं, पोस्टर मामले में भी गश्त और निगरानी व्यवस्था में लापरवाही की जांच हुई। इसके बाद एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने दोनों मामलों में कार्रवाई करते हुए कुल 14 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। पोस्टर मामले में सिविल लाइन थाने के पुलिसकर्मियों और एलआईयू से जुड़े एक दारोगा समेत आठ पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की गई, जबकि सांसद के हाउस अरेस्ट से निकलने के मामले में भी पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया।
मुजफ्फरनगर दंगे की बरसी और सहारनपुर के मस्जिद विवाद के बीच पश्चिमी यूपी में पुलिस प्रशासन पहले से ही सतर्क था। कई राजनीतिक और सामाजिक नेताओं की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी तथा कुछ नेताओं को एहतियातन हाउस अरेस्ट किया गया था। ऐसे में पोस्टरों का सामने आना और हाउस अरेस्ट के बावजूद सांसद का दूसरे जिले तक पहुंच जाना पुलिस की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब पुलिस के सामने पोस्टर लगाने वालों की पहचान करने के साथ-साथ यह पता लगाने की चुनौती है कि इन पोस्टरों के पीछे कौन लोग थे और उन्हें किस उद्देश्य से लगाया गया। वहीं सांसद के हाउस अरेस्ट से निकलने के मामले में भी ड्यूटी व्यवस्था की समीक्षा की जा रही है। प्रशासन का फोकस फिलहाल कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संवेदनशील इलाकों में किसी भी तरह के तनाव को बढ़ने से रोकने पर है।