पटना, 07 सितंबर2026 । बिहार में रिटायर अधिकारी पूनम सिन्हा की संविदा पर दोबारा नियुक्ति का मामला राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव को लेकर कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने सवाल उठाए और इसका विरोध किया। मामला इतना गरमा गया कि डिप्टी सीएम बिजेंद्र यादव और कृषि मंत्री के बीच तीखी बहस की स्थिति बन गई।
गुस्साए कृषि मंत्री का ग्राफ बढ़ा
कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा इन दिनों काफी रिएक्शनरी हो गए हैं। ऐसा कई वाकया है जब वे नाराज होकर जनता के चहेते होते रहे हैं। इस बार नया हलचल ये है कि बिहार कैबिनेट की बैठक में कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा का गुस्सा परवान पर था। कैबिनेट में मामला विधानसभा में पूनम सिन्हा के अवकाश प्राप्त (रिटायरमेंट) करने के बाद फिर से निदेशक पद पर एक्सटेंशन देने का था। कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने इस प्रस्ताव का विरोध करते कहा कि अन्य लोगों को भी मौका देना चाहिए। एक्सटेंशन देते रहेंगे तो फिर उनके पीछे अपनी बारी का इंतजार कर रहे कैसे इस पद की जिम्मेदारी संभालेंगे। युवाओं को भी मौका मिलनी चाहिए। उनके गुस्से का कैबिनेट की बैठक में तो शांत करा दिया गया। मगर, अपने इस गुस्से से वे जेन जी के समर्थन के रथ पर सवार हो गए।
2026 को सेवानिवृत्त हुई थीं। इसके बाद उन्हें एक साल के लिए संविदा के आधार पर फिर से इसी पद की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव कैबिनेट के सामने रखा गया। रिपोर्टों के मुताबिक, कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
यही प्रस्ताव कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा के विरोध की वजह बना। उनका तर्क था कि सेवानिवृत्ति के बाद किसी अधिकारी को लगातार सेवा विस्तार देने के बजाय दूसरे योग्य अधिकारियों को मौका मिलना चाहिए। खासतौर पर युवाओं को आगे बढ़ने का अवसर देने की बात उन्होंने कैबिनेट में रखी।
मामले पर बहस इतनी बढ़ी कि डिप्टी सीएम बिजेंद्र यादव और विजय कुमार सिन्हा के बीच कैबिनेट हॉल के बाहर तक बहस होने की खबर है। हालांकि, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हस्तक्षेप के बाद स्थिति को शांत कराया गया।
पूनम सिन्हा का प्रशासनिक करियर भी इस विवाद को महत्वपूर्ण बनाता है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, वह 1988-89 में बिहार विधानसभा सचिवालय में सहायक के पद पर नियुक्त हुई थीं और बाद में कई पदों पर जिम्मेदारी संभाली। मार्च 2026 में उन्हें विधानसभा का प्रभारी सचिव-सह-निदेशक नियुक्त किया गया था।
इस पूरे प्रकरण ने बिहार सरकार में रिटायर अधिकारियों को संविदा पर दोबारा नियुक्त करने की नीति और नए अधिकारियों को अवसर देने के सवाल को सामने ला दिया है। अब यह मामला केवल एक अधिकारी की नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सरकार के भीतर प्रशासनिक नियुक्तियों और राजनीतिक मतभेदों को लेकर भी चर्चा का विषय बन गया है।