नई दिल्ली, 21 अगस्त 2026 । दिल्ली हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि लंबे समय से साथ रह रहे वयस्कों के रिश्ते को केवल इस आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उन्होंने औपचारिक रूप से शादी नहीं की है। अदालत की टिप्पणी ने वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने के अधिकार को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज कर दी है।
मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने कहा कि दोनों पक्ष सहमति देने की उम्र के बालिग है और उन्हें पसंद के पार्टनर के साथ रहने और जीवन बिताने का अधिकार है। किसी को भी उनके फैसले में बाधा डालने या उनकी जान-माल और स्वतंत्रता को खतरे में डालने का अधिकार नहीं है। सहमति से शादी करने वाले बालिगों के विवाह को जाति, पंथ, रंग, धर्म या आस्था पर अलग नहीं किया जा सकता। संविधान से मिले मौलिक अधिकारों को ‘सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रहों’ के नाम पर सीमित करना व्यक्ति को उसकी स्वतंत्र पहचान से वंचित करने जैसा है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि दो बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से साथ रहने का फैसला लेते हैं तो उनकी निजी जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। ऐसे मामलों में कानून का उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना भी है।
अदालत की टिप्पणी का संबंध एक विशेष मामले के तथ्यों से है। इसलिए इसे हर लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रूप से विवाह के समान घोषित करने वाला सार्वभौमिक नियम नहीं माना जा सकता। विवाह और लिव-इन संबंधों की कानूनी स्थिति अलग-अलग संदर्भों में अलग हो सकती है और अधिकारों का निर्धारण संबंधित कानून तथा मामले के तथ्यों के आधार पर होता है।
दिल्ली हाई कोर्ट की इस टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू वयस्कों की व्यक्तिगत पसंद और निजता से जुड़ा है। अदालतें कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से किसके साथ रहना चाहते हैं, यह उनके निजी अधिकारों और स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है।
ऐसे मामलों में परिवार या अन्य लोगों की असहमति के बावजूद यदि दोनों वयस्क अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं, तो उनकी सुरक्षा और स्वतंत्रता से जुड़े पहलुओं पर अदालत गंभीरता से विचार कर सकती है। हालांकि, किसी भी रिश्ते में हिंसा, जबरदस्ती या अन्य गैरकानूनी गतिविधि की स्थिति अलग होगी और उस पर कानून लागू होगा। हाई कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने लिव-इन रिलेशनशिप, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजी जीवन में हस्तक्षेप की सीमाओं को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी बहस को सामने ला दिया है। इस मामले में अदालत के विस्तृत आदेश और उसके विशिष्ट तथ्यों के आधार पर ही टिप्पणी के कानूनी प्रभाव को पूरी तरह समझा जा सकेगा।