पटना, 14 अगस्त 2026 । बिहार की राजनीति में इस समय प्रशांत किशोर का अभियान चर्चा का विषय बना हुआ है। जन सुराज के जरिए राजनीति में सक्रिय हुए प्रशांत किशोर अब खुद को जनता की समस्याओं और राजनीतिक व्यवस्था को समझने वाले नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। उनके समर्थक उन्हें ‘लोकतंत्र का फिजिशियन’ कह रहे हैं। सवाल यह है कि क्या जनता की नब्ज टटोलने की यह कोशिश आगामी चुनाव में बिहार के पारंपरिक सियासी समीकरणों को बदल पाएगी?
प्रशांत किशोर अब केवल रणनीतिकार ही नहीं राजनीतिज्ञ हो गए हैं। जनता का नब्ज कैसे पकड़ा जाता है, वो इनसे समझे। अभी तक प्रशांत किशोर की घोषणाओं को बारीकी से देखे तो कहां-कहां और कैसे बीजेपी के गढ़ में सेंधमारी करने की कोशिश को अंजाम देना शुरू किया है, ये देखना और जानना बड़ा ही दिलचस्प होगा। प्रशांत किशोर की घोषणाओं में प्रशांत किशोर की राजनीति की असली तस्वीर दिखेगी।
‘स्कूल फीस मैं भरूंगा’
बांकीपुर विधायक प्रशांत किशोर की महत्वपूर्ण घोषणाओं में एक है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाई ठीक नहीं लगी तो निजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का फीस मैं दूंगा। भले ही उन्होंने इस बात के लिए समय लिया कि अगर सरकारी स्कूल के हालत ठीक नहीं कर पाया या ठीक नहीं हुआ तो आप निजी स्कूलों में अपने बच्चों का नाम लिखाएं फीस मैं दूंगा। प्रशांत किशोर ने ऐसा कर मध्यम वर्ग के एक विशाल जनसमूह को एक बड़े सपने से जोड़ दिया। निजी स्कूलों में पढ़ाना एक हरक्यूलियन टास्क हो गया है। ऐसे में ये सुविधा बांकीपुर के तमाम जाति और धर्म के बच्चों के बेहतर भविष्य के प्रति आगाह करता है। ये एक तरह से प्रशांत किशोर का किसी भी घर में हर माह फीस के बहाने याद करना अनिवार्य हो जाएगा। ये जुड़ाव लोकतंत्र की मजबूती और अन्य विधायक के कर्तव्य बोध का भान कराने के लिए काफी है।
जन सुराज के सामने बड़ी चुनौती
प्रशांत किशोर की लोकप्रियता और उनके अभियानों की चर्चा के बावजूद चुनावी राजनीति में संगठन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बिहार के गांवों और बूथ स्तर तक मजबूत संगठन खड़ा करना जन सुराज के लिए आसान नहीं होगा।
इसके अलावा बीजेपी, जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस जैसे स्थापित दलों के पास लंबे समय से तैयार राजनीतिक संगठन और कार्यकर्ता नेटवर्क मौजूद है। ऐसे में प्रशांत किशोर को अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए लगातार मेहनत करनी होगी।
क्या बदलेंगे बिहार के सियासी समीकरण?
प्रशांत किशोर की राजनीति बिहार में कितना असर डालेगी, इसका वास्तविक आकलन चुनावी नतीजों के बाद ही संभव होगा। लेकिन इतना जरूर है कि उनका अभियान पारंपरिक राजनीतिक मुद्दों के बीच रोजगार, शिक्षा और पलायन जैसे विषयों को प्रमुखता देने की कोशिश कर रहा है।
अगर जन सुराज बड़ी संख्या में उन मतदाताओं को अपने साथ जोड़ पाता है जो मौजूदा राजनीतिक दलों से अलग विकल्प चाहते हैं, तो बिहार की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। वहीं अगर यह समर्थन वोट में तब्दील नहीं हुआ, तो इसका असर सीमित भी रह सकता है।
फिलहाल ‘लोकतंत्र के फिजिशियन’ का नैरेटिव प्रशांत किशोर की राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा बन चुका है। अब असली परीक्षा जनता की नब्ज समझने से आगे बढ़कर उस नब्ज को चुनावी समर्थन में बदलने की होगी।