तीन बेटियों को पढ़ा-लिखाकर बनाया आत्मनिर्भर, लेकिन अंतिम विदाई में नहीं पहुंचीं

पिता का अंतिम संस्कार वीडियो कॉल पर देखने की घटना ने झकझोरा

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सोनीपत, 06 अगस्त 2026 । एक पिता जिसने जीवनभर मेहनत कर अपनी तीनों बेटियों को पढ़ाया-लिखाया और आत्मनिर्भर बनाया, उसकी अंतिम विदाई बेहद भावुक परिस्थितियों में हुई। पिता के निधन के बाद अंतिम संस्कार में तीनों बेटियों में से कोई भी शामिल नहीं हो सकी। बताया गया कि उन्होंने अंतिम संस्कार के खर्च के लिए 5,100 रुपये भेजे और वीडियो कॉल के माध्यम से अपने पिता की अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार को देखा। इस घटना ने परिवार, रिश्तों और बदलती सामाजिक परिस्थितियों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

तीनों बेटियों को फोन पर दी थी जानकारी

वृद्धाश्रम के संचालक आनंद कुमार ने बताया कि शिवचरण गुप्ता पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। करीब 20 दिन पहले उनकी बेटियों अनिता, निशा और प्रिया को उनके स्वास्थ्य की जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद कोई भी उनसे मिलने नहीं पहुंचा। संचालक के अनुसार, शिवचरण गुप्ता अपनी बेटियों से बात करने के लिए हमेशा एक मोबाइल फोन अपने पास रखते थे, लेकिन बीमारी बढ़ने के बाद बेटियों के फोन भी आने बंद हो गए। आनंद कुमार ने बताया कि बुजुर्ग की मृत्यु के बाद भी तीनों बेटियों को सूचना दी गई। उनसे कहा गया कि यदि वे आ रही हैं तो अंतिम संस्कार कुछ समय के लिए रोक दिया जाएगा, लेकिन उन्होंने समय नहीं होने की बात कहकर आने से इनकार कर दिया।

एक बेटी नेपाल तो दो भारत में रहती हैं

बताया गया कि बड़ी बेटी अनिता नेपाल में अध्यापिका है, दूसरी बेटी निशा उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहती है, जबकि सबसे छोटी बेटी प्रिया मुंबई में रहती है। तीनों बेटियों ने अंतिम संस्कार में शामिल होने के बजाय वीडियो कॉल के जरिए अपने पिता की अंतिम यात्रा देखी। बड़ी बेटी ने ऑनलाइन 5,100 रुपये भेजकर अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने को कहा। वृद्धाश्रम के संचालक के मुताबिक, शुरुआत में बेटियों ने अस्थियां सुरक्षित रखने की बात कही थी, लेकिन बाद में यह कह दिया कि उनके पास समय नहीं है और वृद्धाश्रम ही गंगा में अस्थियां प्रवाहित कर दे। इतना ही नहीं, उन्होंने अंतिम संस्कार की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग भी भेजने का अनुरोध किया।

जानकारी के अनुसार, पिता ने अपनी बेटियों की शिक्षा और भविष्य के लिए जीवनभर संघर्ष किया। उन्हें बेहतर जीवन देने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए, लेकिन उनके निधन के समय परिस्थितियां ऐसी बनीं कि बेटियां अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सकीं। इस घटना की चर्चा स्थानीय स्तर पर तेजी से फैल गई और लोगों ने इसे भावनात्मक और सामाजिक दृष्टि से गंभीर विषय बताया।

परिवार से जुड़े लोगों का कहना है कि बेटियों ने आर्थिक सहयोग के रूप में 5,100 रुपये भेजे और वीडियो कॉल के जरिए अंतिम संस्कार की प्रक्रिया देखी। हालांकि, उनके अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाने के पीछे क्या कारण थे, इसे लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं हो रही हैं। आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं हुई है कि अनुपस्थिति की वजह व्यक्तिगत, पारिवारिक, स्वास्थ्य संबंधी या अन्य कोई परिस्थिति थी।

यह घटना आधुनिक जीवनशैली, दूरियों और पारिवारिक रिश्तों पर भी चर्चा का विषय बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते समय में रोजगार, प्रवास और अन्य जिम्मेदारियों के कारण कई बार परिवारों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, प्रत्येक मामले की अपनी अलग परिस्थितियां होती हैं, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी तथ्यों को समझना आवश्यक है।

इस घटना ने समाज में बुजुर्गों की देखभाल, पारिवारिक जिम्मेदारियों और रिश्तों के महत्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर भी लोग इस मामले पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं और पारिवारिक मूल्यों तथा संवेदनशीलता को लेकर चर्चा कर रहे हैं।

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