देहरादून, 16 जुलाई 2026 । उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ड्रंक ड्राइविंग से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल किसी व्यक्ति के मुंह से शराब की बदबू आना यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वह नशे की हालत में वाहन चला रहा था। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई के लिए वैज्ञानिक और ठोस साक्ष्यों का होना आवश्यक है।
ट्रायल कोर्ट को मामले को आगे बढ़ाने का निर्देश
जस्टिस आलोक महरा ने चमोली के रहने वाले अमर सिंह की क्रिमिनल रिवीजन याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत लगे आरोप को रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने धारा 125(ए) (चोट पहुचाना), 125(बी (गंभीर चोट पहुंचाना) और 281 (तेज या लापरवाही से गाड़ी चलाना) के तहत आरोपों को बरकरार रखा और ट्रायल कोर्ट को मामले में तेजी से आगे बढ़ने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ड्रंक ड्राइविंग के आरोप को साबित करने के लिए पुलिस और जांच एजेंसियों को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। इसमें ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट, मेडिकल जांच या अन्य स्वीकार्य वैज्ञानिक साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केवल गंध या अनुमान के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सड़क सुरक्षा और नशे में वाहन चलाने पर सख्त कार्रवाई जरूरी है, लेकिन कार्रवाई कानून के अनुरूप और पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर ही होनी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया का अधिकार प्राप्त है।
इस फैसले को ड्रंक ड्राइविंग से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे जांच एजेंसियों को साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया को और अधिक मजबूत एवं वैज्ञानिक बनाने पर जोर देना होगा, ताकि सड़क सुरक्षा और नागरिकों के कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।