ऋषिकेश, 15 जुलाई 2026 । पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के जारी अनशन के बीच प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और आईआईटी के पूर्व प्रोफेसर प्रो. जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) एक बार फिर चर्चा में हैं। वांगचुक के लंबे अनशन ने कई लोगों को जीडी अग्रवाल की याद दिलाई है, जिन्होंने गंगा नदी के संरक्षण और उसकी अविरल-निर्मल धारा की मांग को लेकर वर्षों तक संघर्ष किया था। वांगचुक के मौजूदा अनशन को लेकर भी देशभर में बहस जारी है और उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई जा रही है।
इंजीनियर से पर्यावरण वैज्ञानिक बनने तक का सफर
प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुआ था। उन्होंने उस समय की यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की (अब आईआईटी रुड़की) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। शुरुआती दौर में उन्होंने उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग में डिजाइन इंजीनियर के रूप में काम किया।
प्रो. जी.डी. अग्रवाल देश के प्रतिष्ठित पर्यावरण इंजीनियरों में गिने जाते थे। उन्होंने आईआईटी रुड़की (तत्कालीन यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की) में अध्यापन किया और बाद में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के सदस्य सचिव भी रहे। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने संन्यास ग्रहण कर स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद नाम धारण किया और अपना पूरा जीवन गंगा संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। वर्ष 2018 में उन्होंने गंगा नदी पर बांध परियोजनाओं को रोकने और नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने की मांग को लेकर अनशन शुरू किया। करीब 111 दिनों तक चले इस अनशन के दौरान उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई और 11 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया। इससे पहले वर्ष 2009 में भी उनके अनशन के बाद भागीरथी नदी पर एक जलविद्युत परियोजना को रोकने का फैसला लिया गया था।
आज जब सोनम वांगचुक अपने मुद्दों को लेकर अनशन पर हैं, तब कई लोग जीडी अग्रवाल के आंदोलन को याद कर रहे हैं। हालांकि, दोनों आंदोलनों की मांगें और परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन दोनों ने शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के लिए अनशन का रास्ता चुना।