चंडीगढ़, 17 जून् 2026 । हिमाचल प्रदेश में एक नए विवाद ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। कुछ निहंग सिख समूहों द्वारा 21 जून के बाद कथित तौर पर ‘खालसा टैक्स’ शुरू करने की चेतावनी दिए जाने के बाद राज्य सरकार और प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। इस बयान के सामने आने के बाद कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है। मिसाल साहिबज़ादा बाबा जुझार सिंह जी चमकौर साहिब के आनंदपुर साहिब गुट का प्रतिनिधित्व करने वाले बाबा अचर सिंह कहा कि इस मुद्दे पर पंजाब और हिमाचल प्रदेश सरकार से कई बार अपील की गई, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने मांग की कि या तो हिमाचल सरकार एंट्री टैक्स वापस ले या पंजाब सरकार भी जवाबी कार्रवाई करते हुए हिमाचल की गाड़ियों पर टैक्स लगाए।
हिमाचल सरकार ने बाहरी वाहनों की एंट्री फीस बढ़ाई
बता दें कि यह विवाद तब शुरू हुआ जब हिमाचल सरकार ने बाहरी राज्यों के वाहनों के लिए एंट्री फीस बढ़ा दी। हालांकि बाद में निजी वाहनों के लिए शुल्क 170 रुपये से घटाकर 100 रुपये कर दिया गया, लेकिन पंजाब में इसे लेकर नाराजगी बनी रही। 3 जून को निहंग सिखों ने गरामौड़ा टोल प्लाजा के पास किरतपुर साहिब-मनाली रोड पर एक अस्थायी चेकपॉइंट बनाकर करीब एक घंटे तक सांकेतिक खालसा टैक्स वसूला था। यह राशि स्वैच्छिक थी और 10 रुपये से शुरू की गई थी। प्रदर्शनकारियों ने हिमाचल के एंट्री टैक्स की तुलना ऐतिहासिक ‘जजिया टैक्स’ से की।
रिपोर्ट्स के अनुसार, संबंधित समूहों ने अपनी मांगों और धार्मिक-सामाजिक मुद्दों को लेकर यह चेतावनी दी है। हालांकि, राज्य प्रशासन का कहना है कि किसी भी प्रकार का कर या शुल्क वसूलने का अधिकार केवल संवैधानिक और कानूनी संस्थाओं के पास होता है। ऐसे में यदि कोई संगठन या समूह कानून के दायरे से बाहर जाकर किसी प्रकार की वसूली का प्रयास करता है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
इस घटनाक्रम के बाद स्थानीय प्रशासन ने स्थिति पर नजर रखना शुरू कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता है और किसी भी तरह की अवैध गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सुरक्षा एजेंसियां भी मामले से जुड़े घटनाक्रमों पर नजर बनाए हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान संवेदनशील क्षेत्रों में तनाव बढ़ा सकते हैं, इसलिए सभी पक्षों को संवाद और कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखनी चाहिए। वहीं, सामाजिक संगठनों ने भी लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और प्रशासन के आधिकारिक निर्देशों का पालन करने की अपील की है।
फिलहाल, सरकार और प्रशासन की नजर 21 जून के बाद की स्थिति पर बनी हुई है। यदि इस संबंध में कोई कदम उठाया जाता है, तो उसके कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाएगा। आने वाले दिनों में यह मुद्दा हिमाचल प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में चर्चा का प्रमुख विषय बना रह सकता है।