‘सुदर्शन’ मंत्र के जरिए सीएम योगी का संदेश, भगवान राम और श्रीकृष्ण के उदाहरण से धर्म और कर्तव्य पर दिया जोर
लखनऊ, 01 जून् 2026 । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में धर्म, कर्तव्य और समाज में न्याय की स्थापना को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया। अपने संबोधन में उन्होंने ‘सुदर्शन’ का उल्लेख करते हुए कहा कि जब समाज में अन्याय, अराजकता और अधर्म बढ़ता है, तब धर्म की रक्षा और व्यवस्था की पुनर्स्थापना के लिए निर्णायक कदम आवश्यक हो जाते हैं। उन्होंने अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के जीवन प्रसंगों का भी उल्लेख किया।
इस दौरान उन्होंने कहा कि सम्मान समारोह इस बात का प्रतीक है कि सार्थक दिशा में किए जाने वाले परिश्रम का परिणाम अवश्य प्राप्त होगा। सीएम योगी ने आगे कहा कि किसी भी छात्र-छात्रा के लिए उसका पहला गुरु अभिभावक होता है। उन्हें अपने बच्चों को संस्कारित और शिक्षित करने की जरूरत है। साथ ही, धर्म की स्थापना के लिए सुदर्शन चक्र की आवश्यकता की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि जब सुदर्शन होगा तभी यह देश सुरक्षित होगा।
सीएम योगी ने कहा कि युग अलग-अलग हो सकता है, लेकिन स्थिति-परिस्थितियां एक जैसी नहीं हो सकती। समय के अनुरूप मुरली की आवश्यकता वृंदावन में थी, लेकिन धर्म की स्थापना के लिए सुदर्शन चक्र भी आवश्यक है। गुरु संदीपन ने इसे महसूस किया था और कृष्ण के हाथों से मुरली वृंदावन में रखवा कर सुदर्शन लेकर के निकल पड़े। सुदर्शन होगा तभी धर्म के स्थापना होगी, तभी यह देश सुरक्षित होगा।
अपने संबोधन में सीएम योगी ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि समाज में शांति, सुरक्षा और न्याय की स्थापना के लिए सभी नागरिकों को अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना चाहिए। उन्होंने युवाओं से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया। उनके अनुसार, जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करता है, तभी समाज और राष्ट्र दोनों सशक्त बनते हैं।
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री का यह बयान केवल धार्मिक संदर्भ तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें सुशासन, सामाजिक अनुशासन और कानून व्यवस्था का संदेश भी निहित था। भगवान राम और श्रीकृष्ण के उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने नैतिकता, न्याय और कर्तव्यनिष्ठा को समाज के लिए आवश्यक बताया।
मुख्यमंत्री के इस संबोधन की राजनीतिक और सामाजिक हलकों में व्यापक चर्चा हो रही है। समर्थक इसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिक नेतृत्व का संदेश बता रहे हैं, जबकि विभिन्न वर्ग इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से देख रहे हैं।