बिहार , 23 मई 2026 । बिहार में हाल के पुलिस एनकाउंटर मामलों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कई नेताओं द्वारा इन घटनाओं में ‘कास्ट फैक्टर’ यानी जातीय एंगल तलाशने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जबकि पुलिस का कहना है कि कार्रवाई केवल अपराध और कानून व्यवस्था के आधार पर की जा रही है।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि एनकाउंटर मामलों में खास जातियों के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर कई नेताओं और पूर्व अधिकारियों का कहना है कि अपराधियों को जाति के चश्मे से देखना कानून व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई पर अनावश्यक सवाल खड़े करता है। उनका तर्क है कि अपराध का कोई धर्म या जाति नहीं होती और पुलिस को केवल कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए।
बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरण और कास्ट फैक्टर एक नंगा सच है। जी हां, ये हम नहीं कहते हैं। ये सियासत को समझने वाले बड़े- बड़े राजनीतिक पंडित सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं। कुछ समय पहले जब बिहार में जातिगत जनगणना हुई, तो इसका मकसद जातिगत राजनीति को जातियों की संख्या के हिसाब से देखने का था। हालांकि, मकसद ये बताया गया कि बिहार के विकास वाली योजनाओं में उनकी भागीदारी को स्पष्ट किया जाएगा। लेकिन सच्चाई हर कोई जानता है। फिलहाल, बिहार में चुनावी राजनीति और सियासत से इतर अपराधियों को लेकर कास्ट पॉलिटिक्स होने लगी है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का आरोप कि बिहार में जाति देखकर एनकाउंटर हो रहा है, इसकी महज एक बानगी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में जब भी कोई बड़ा अपराध, पुलिस कार्रवाई या एनकाउंटर होता है, तो राजनीतिक दल उसे सामाजिक और जातीय नजरिए से जोड़कर देखने लगते हैं। इससे कानून व्यवस्था का मुद्दा राजनीतिक बहस में बदल जाता है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है ,एनकाउंटर और गिरफ्तारी जैसी कार्रवाइयां पूरी जांच और इनपुट के आधार पर की जाती हैं। उनका दावा है कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में किसी जातीय पहचान को आधार नहीं बनाया जाता। हालांकि विपक्षी दल लगातार पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की मांग उठा रहे हैं।
सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि अपराध और जाति को जोड़ने से समाज में विभाजन और अविश्वास बढ़ सकता है। उनका मानना है कि कानून व्यवस्था के मुद्दों को राजनीतिक लाभ से अलग रखते हुए निष्पक्ष जांच और न्याय व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखना जरूरी है।