पटना , 23 मार्च 2026 । बिहार की राजनीति में नया मोड़ तब आया जब विपक्ष ने जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह को मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठाकर सियासी समीकरणों को उलझा दिया। इस दांव के जरिए विपक्ष ने सवर्ण वोट बैंक को साधने की कोशिश करते हुए एनडीए को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है।
राज्यसभा चुनाव में भूमिहार राजद नेता एडी सिंह को राज्यसभा भेजने के मुख्य रणनीतिकार विधायक आईपी गुप्ता ने अब एक नई जंग मुख्यमंत्री बनाने की छेड़ दी है। इस जंग में वे एक भूमिहार नेता केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह को बिहार का अगला मुख्यमंत्री बनाने की वकालत कर रहे हैं। आखिर सवर्ण नेता पर विधायक आईपी गुप्ता इतने मेहरबान क्यों है? वह भी तब जब यह माना जा रहा है कि अगला सीएम भाजपा का होगा। पढ़िए आईपी गुप्ता के बयान की डीकोडिंग।
क्या कहा आई पी गुप्ता ने?
राजद के विधायक आईपी गुप्ता ने राज्य में अगले सीएम को ले कर बयान दिया और एनडीए की हालात आगे सांप पीछे खाई वाली हो गई है। आईपी गुप्ता ने मीडिया से बात करके हुए कहा कि ‘इस राज्य को श्री कृष्ण सिंह, कर्पूरी ठाकुर, नीतीश कुमार जैसे समाजवादी नेता ने ही चलाया है। अभी भी एनडीए में एक ऐसे नेता हैं जो समाजवादी धारा के राजनीतिज्ञ हैं। ये नेता जय प्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर और नीतीश कुमार के साथ काम कर चुके हैं। एक नाम काफी चर्चित है और वो हैं केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह। क्यों नहीं इन्हें ही बिहार का अगला मुख्यमंत्री बना दिया जाए।’
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले से ही राजनीतिक संतुलन साधने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन यह मांग उनके नेतृत्व पर परोक्ष दबाव बनाती दिख रही है। वहीं, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के लिए भी यह स्थिति रणनीतिक रूप से संवेदनशील बन गई है, क्योंकि बिहार में सामाजिक समीकरण बेहद जटिल हैं।
विपक्ष की इस रणनीति के पीछे स्पष्ट संदेश है—जातीय और सामाजिक संतुलन को मुद्दा बनाकर NDA के भीतर संभावित मतभेदों को उभारना। ललन सिंह एक सवर्ण चेहरे के रूप में सामने आते हैं, जिससे यह मांग खास राजनीतिक महत्व रखती है।
हालांकि, जदयू और भाजपा दोनों ही इस मुद्दे पर खुलकर प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मांग ज्यादा एक “राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति” है, न कि वास्तविक सत्ता परिवर्तन का संकेत।
नीतीश कुमार के नेतृत्व में फिलहाल सरकार स्थिर दिखाई देती है, लेकिन इस तरह के बयान आने वाले चुनावों से पहले गठबंधन की आंतरिक राजनीति को जरूर प्रभावित कर सकते हैं।
आगे की राह में NDA के सामने दो विकल्प हैं—या तो इस मुद्दे को नजरअंदाज कर स्थिरता बनाए रखी जाए, या फिर सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नई रणनीति तैयार की जाए। वहीं, विपक्ष इस मुद्दे को और हवा देकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करेगा।
कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति में यह नया दांव आने वाले समय में सियासी हलचल को और तेज कर सकता है, जहां अब सबकी नजरें नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की अगली रणनीति पर टिकी हैं।