मणिपुर–मिजोरम के 5,800 ब्नेई मेनाशे लोगों की इजराइल वापसी: आस्था, पहचान और ऐतिहासिक पुनर्मिलन की कहानी
चुराचंदपुर, 01 जनवरी 2026 । मणिपुर और मिजोरम में रहने वाले ब्नेई मेनाशे समुदाय के करीब 5,800 लोगों की इजराइल वापसी की प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा में है। इसे धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक पुनर्मिलन से जोड़कर देखा जा रहा है। ब्नेई मेनाशे समुदाय खुद को यहूदी जनजाति मेनाशे की संतति मानता है और दशकों से इजराइल में बसने की इच्छा व्यक्त करता रहा है।
मणिपुर और मिजोरम में बसे ब्नेई मेनाशे समुदाय (यहूदी) के करीब 5,800 लोगों की इजराइल वापसी की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। इजराइली कैबिनेट की ओर से ढाई सौ करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दिए जाने के बाद चरणबद्ध तरीके से समुदाय को इजराइल ले जाया जाएगा।
2026 तक समुदाय के 1,200 लोग इजराइल भेजे जाएंगे। जबकि, 2030 तक पूरी ‘घर वापसी’ का लक्ष्य रखा गया है। पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों में बसा यह समुदाय खुद को बाइबिल की ‘दस खोई हुई जनजातियों’ में से मेनाशे का वंशज मानता है।
2700 साल पहले असिरियन निर्वासन के बाद वे पूर्व की ओर बढ़े और अंत में भारत में बस गए। इजराइल सरकार की नई योजना से उनकी ‘घर वापसी’ तेज हो रही है। इसके तहत 2030 तक पूरी कम्युनिटी को इजराइल में बसाया जाएगा। हालांकि इस तेजी के पीछे मणिपुर की जातीय हिंसा की त्रासदी भी छिपी बताई जा रही है।
इस वापसी को केवल प्रवास नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और भावनात्मक यात्रा के रूप में देखा जा रहा है। समुदाय के लोगों का कहना है कि यह उनके पूर्वजों की भूमि से दोबारा जुड़ने का अवसर है। वहीं, इजराइल में बस चुके ब्नेई मेनाशे परिवारों के साथ पुनर्मिलन की उम्मीद ने इस प्रक्रिया को और भी खास बना दिया है।
हालांकि, इस कदम के सामाजिक और प्रशासनिक पहलू भी अहम हैं। मणिपुर और मिजोरम जैसे राज्यों में यह समुदाय लंबे समय से स्थानीय समाज का हिस्सा रहा है। ऐसे में उनकी बड़ी संख्या में वापसी से सामाजिक ढांचे, पारिवारिक रिश्तों और स्थानीय आबादी पर भी असर पड़ सकता है। प्रशासनिक स्तर पर दस्तावेज़ी प्रक्रिया, यात्रा और पुनर्वास से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
कुल मिलाकर, मणिपुर–मिजोरम के 5,800 ब्नेई मेनाशे लोगों की इजराइल वापसी आस्था, पहचान और इतिहास से जुड़ा एक अनोखा अध्याय है। यह न केवल एक समुदाय की सदियों पुरानी आकांक्षा को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों की जटिलताओं को भी उजागर करता है।