हरियाणा , 15 अक्टूबर 2026 । हरियाणा में असिस्टेंट प्रोफेसर (भूगोल) भर्ती परीक्षा को चुनौती देने वाले अभ्यर्थियों को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से झटका लगा है। अदालत ने हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC) की अंतिम उत्तर कुंजी और स्क्रीनिंग परीक्षा के परिणाम को चुनौती देने वाली 16 याचिकाएं खारिज कर दी हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि हरियाणा की परीक्षा में बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की परीक्षा के कई सवाल दोहराए गए थे। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सवाल दोहराए जाने से प्रतियोगी परीक्षा अपने आप अवैध या अनुचित नहीं हो जाती।
न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने माना कि परीक्षा में प्रश्नों की पुनरावृत्ति अपने आप में परीक्षा रद्द करने का पर्याप्त आधार नहीं है। याचिकाकर्ता यह ठोस प्रमाण भी नहीं दे सके कि किसी उम्मीदवार को प्रश्नपत्र पहले से उपलब्ध था या किसी अभ्यर्थी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने की थी यह मांग
ब्रह्मपाल और अन्य याचिकाकर्ताओं ने अदालत में याचिका दायर कर फाइनल आंसर की में सुधार, सभी उम्मीदवारों की ओएमआर शीट का दोबारा मूल्यांकन और संशोधित परिणाम एवं मेरिट लिस्ट जारी करने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि हरियाणा की परीक्षा में 30 सवाल ऐसे थे जो 29 अप्रैल 2025 को इसी पद के लिए आयोजित बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा में भी पूछे गए थे। बिहार की परीक्षा हरियाणा की परीक्षा से करीब दो महीने पहले हुई थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि 100 में से 46 सवाल विवादित थे। आयोग ने फाइनल आंसर की में 10 सवाल हटा दिए थे और छह अन्य सवालों के जवाब बदल दिए थे। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, प्रोविजनल आंसर की में छह सवालों के जवाब सही थे, लेकिन बाद में उन्हें बदलने से उम्मीदवारों को नुकसान हुआ।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला हरियाणा में असिस्टेंट प्रोफेसर (भूगोल) के पदों पर भर्ती के लिए आयोजित स्क्रीनिंग परीक्षा से जुड़ा है। बिहार लोक सेवा आयोग ने इसी पद से संबंधित परीक्षा 29 अप्रैल 2025 को आयोजित की थी, जबकि हरियाणा की स्क्रीनिंग परीक्षा 8 जून 2025 को हुई थी।
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि हरियाणा की परीक्षा में BPSC की परीक्षा के 30 सवाल हूबहू दोहराए गए। उन्होंने यह भी कहा कि कुल 100 सवालों में से 46 सवालों को लेकर विवाद था। इनमें ऐसे प्रश्न भी शामिल थे, जिनके उत्तर अंतिम उत्तर कुंजी में बदले गए या जिन्हें परीक्षा से हटा दिया गया।
अभ्यर्थियों ने उत्तर कुंजी में संशोधन, सभी उम्मीदवारों की OMR शीट का दोबारा मूल्यांकन और संशोधित परिणाम तथा नई मेरिट सूची जारी करने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने विशेषज्ञों की राय को क्यों माना अहम?
अदालत ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षा के प्रश्नों और उत्तर कुंजी की शैक्षणिक शुद्धता का आकलन करना विषय विशेषज्ञों का काम है। न्यायालय सामान्य तौर पर विशेषज्ञों की राय की जगह अपनी राय नहीं रख सकता। हस्तक्षेप तभी उचित होता है, जब उत्तर कुंजी में स्पष्ट और प्रमाणित गलती दिखाई दे या निर्णय मनमाना अथवा दुर्भावनापूर्ण साबित हो।
अदालत के सामने याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि आयोग ने जानबूझकर किसी उम्मीदवार को फायदा पहुंचाया था या प्रश्न दोहराए जाने से उन्हें ऐसा ठोस नुकसान हुआ, जिसके आधार पर पूरी परीक्षा को अवैध घोषित किया जाना चाहिए।
पीठ ने यह भी माना कि केवल प्रश्नों की पुनरावृत्ति से परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करना पर्याप्त नहीं है। जब सभी उम्मीदवारों को एक ही प्रश्नपत्र दिया गया और बदलाव समान रूप से लागू किए गए, तो परीक्षा रद्द करने का आधार स्थापित नहीं हुआ।
16 याचिकाएं खारिज, भर्ती प्रक्रिया को राहत
हाईकोर्ट ने सभी 16 याचिकाओं को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने अंतिम उत्तर कुंजी, अभ्यर्थियों की आपत्तियां खारिज करने के फैसले और स्क्रीनिंग परीक्षा के परिणाम में ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी दोष नहीं पाया, जिसके कारण हस्तक्षेप जरूरी हो।
इस फैसले से हरियाणा असिस्टेंट प्रोफेसर (भूगोल) भर्ती प्रक्रिया को राहत मिली है। अदालत ने अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिए। हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी परीक्षा में प्रश्नपत्र या उत्तर कुंजी से जुड़ी शिकायतें कभी स्वीकार नहीं की जा सकतीं। यदि किसी मामले में वास्तविक अनियमितता, स्पष्ट त्रुटि या अनुचित लाभ का ठोस प्रमाण सामने आता है, तो उसकी जांच अलग आधार पर हो सकती है।
इस मामले में अदालत का मुख्य संदेश है कि किसी पुराने प्रश्नपत्र से सवाल दोहराए जाने भर से परीक्षा रद्द नहीं की जा सकती। चुनौती देने वाले अभ्यर्थियों को यह दिखाना होगा कि परीक्षा में वास्तविक अनियमितता हुई है, आयोग का निर्णय मनमाना था या किसी उम्मीदवार को अनुचित लाभ मिला।
इस फैसले में अदालत ने प्रश्नों की पुनरावृत्ति, उत्तर कुंजी में बदलाव और प्रश्न हटाने की प्रक्रिया को अलग-अलग पहलुओं के रूप में देखा। अंततः आयोग की विशेषज्ञ समीक्षा और सभी अभ्यर्थियों के साथ समान व्यवहार को ध्यान में रखते हुए याचिकाएं खारिज कर दी गईं।