नई दिल्ली, 05 अक्टूबर 2026 । दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए दर्दनाक PG हादसे के बाद जर्जर और असुरक्षित इमारतों के खिलाफ शुरू हुआ MCD का अभियान अब कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। निगम ने हादसे के बाद कई इलाकों में असुरक्षित और नियमों का उल्लंघन करने वाली इमारतों पर कार्रवाई शुरू की थी। लेकिन कुछ भवन मालिकों ने अदालत का रुख किया, जिसके बाद डिमोलिशन की प्रक्रिया को लेकर अदालत ने जरूरी जांच और प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया है।
मामले में अदालत का रुख यह है कि केवल किसी भवन को खतरनाक घोषित कर देने के आधार पर तुरंत उसे गिराने की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि भवन की वास्तविक संरचनात्मक स्थिति क्या है और MCD की कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार है या नहीं।
- हादसे के बाद एक बड़ी लापरवाही यह सामने आई कि बिल्डिंग मालिकों ने 5-6 दशक पुरानी बिल्डिंगों के ऊपर कई मंजिलें बगैर पिलर के ही बना डालीं।
- जिस पीजी में यह हादसा हुआ, उसका मालिक बेसमेंट को कवर करके कुछ और कमरे बनाने की तैयारी कर रहा था।
- इसी दौरान यह हादसा हुआ और पांच मंजिला बिल्डिंग भरभराकर जमीन पर आ गिरी।
- तब लोगों को पता चला कि पांच मंजिला बिल्डिंग बगैर पिलर के ही खड़ी हुई थी। इसके ठीक बराबर वाली बिल्डिंग को भी इसी तरह से बनाया गया था।
कई इलाकों में हुई थी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई
सत्य निकेतन हादसे के बाद MCD ने सिर्फ इसी इलाके तक कार्रवाई सीमित नहीं रखी। मुखर्जी नगर, जनकपुरी, लक्ष्मी नगर, उत्तम नगर, पांडव नगर समेत कई इलाकों में अवैध और असुरक्षित निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की गई।
MCD के शुरुआती अभियान में बड़ी संख्या में PG संपत्तियों का सर्वे किया गया था। बाद में दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष निगम ने बताया कि शहर में 2,453 PG इमारतों की पहचान हुई है। इनमें करीब 32,247 कमरे और लगभग 50,529 लोग रह रहे थे।
कोर्ट ने क्यों लगाई डिमोलिशन पर रोक?
मामला तब अदालत पहुंचा जब कुछ संपत्ति मालिकों ने MCD के आदेशों को चुनौती दी। उनका कहना था कि उनकी इमारतों को बिना पर्याप्त भौतिक या संरचनात्मक जांच के खतरनाक घोषित कर दिया गया।
18 सितंबर 2026 के एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने MCD को संबंधित संपत्ति का उचित निरीक्षण करने और यह निर्धारित करने का निर्देश दिया कि इमारत वास्तव में खतरनाक स्थिति में है या नहीं। मामला सत्य निकेतन की एक संपत्ति से जुड़ा था, जहां MCD ने खतरनाक स्थिति का आदेश जारी किया था।
अब पहले स्ट्रक्चरल जांच, फिर कार्रवाई
अदालत के रुख के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि जर्जर इमारतों के खिलाफ कार्रवाई में सुरक्षा के साथ-साथ उचित प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है।
यानी यदि किसी भवन को गिराने का आदेश दिया जाता है तो उसकी संरचनात्मक स्थिति, उपलब्ध दस्तावेज और संबंधित तकनीकी पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण होगी। इससे एक तरफ खतरनाक इमारतों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश होगी, वहीं दूसरी तरफ बिना पर्याप्त आधार के किसी संपत्ति को गिराए जाने की शिकायतों पर भी रोक लगेगी।
70 फीसदी से ज्यादा PG के बिल्डिंग प्लान नहीं मिले
सत्य निकेतन हादसे के बाद MCD के सामने एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती भी सामने आई। सितंबर के अंत में दिल्ली हाई कोर्ट को निगम ने बताया कि पहचाने गए 2,453 PG भवनों में से 70 फीसदी से ज्यादा के बिल्डिंग प्लान उपलब्ध रिकॉर्ड में ट्रेस नहीं हो सके।
MCD के अनुसार, सिर्फ 730 भवनों के स्वीकृत या उपलब्ध बिल्डिंग प्लान को ट्रेस या वेरिफाई किया जा सका था। निगम ने इसके पीछे कई इमारतों की पुरानी उम्र और कई बार बदल चुके मालिकाना हक को वजह बताया।
543 संपत्तियां ध्वस्त, 178 सील
हाई कोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसार, 17 दिनों की कार्रवाई में MCD ने 543 संपत्तियों को ध्वस्त किया और 178 संपत्तियों को अनधिकृत निर्माण के कारण सील किया था।
वहीं, सत्य निकेतन में करीब 300 संपत्तियों के विस्तृत निरीक्षण में 101 जगहों पर PG चलने की जानकारी सामने आई। इससे साफ है कि हादसे के बाद दिल्ली में PG और छात्र आवासों की निगरानी का मुद्दा कितना बड़ा हो गया है।
सुरक्षा और कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन बड़ी चुनौती
सत्य निकेतन हादसे ने यह सवाल गंभीर बना दिया है कि दिल्ली में पुरानी और कमजोर इमारतों की पहचान कैसे हो और उन पर समय रहते कार्रवाई कैसे की जाए। दूसरी ओर, किसी संपत्ति को गिराने से पहले मालिकों को उचित प्रक्रिया और अपनी बात रखने का अवसर मिलना भी कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है।
ऐसे में आगे MCD की कार्रवाई केवल डिमोलिशन तक सीमित रहने के बजाय स्ट्रक्चरल ऑडिट, बिल्डिंग प्लान की जांच, PG संचालन की अनुमति और सुरक्षा मानकों पर भी केंद्रित हो सकती है।