पटना, 16 सितंबर 2026। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण और सामाजिक बराबरी को लेकर बयानबाजी के बीच केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख जीतन राम मांझी का नया बयान चर्चा में है। मांझी ने ‘ठाकुर का कुआं’ के बाद अब ‘तालाब का पानी’ का जिक्र करते हुए कहा कि अब सभी को तालाब का पानी पीना होगा। उनके इस बयान को जातिगत असमानता और सामाजिक बराबरी के मुद्दे से जोड़कर देखा जा रहा है।
UCC में दांव-पेच की बात करना समझ से परे: मांझी
जीतन राम मांझी ने HAM पार्टी की तरफ से यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को हरी झंडी दे दी है। जीतन राम मांंझी इस मामले में खुल कर केंद्र की मोदी सरकार और अमित शाह के पक्ष में खड़े हो गए हैं। बिहार में सहयोगी JDU के नरम गरम रुख के बाद भी जीतन राम मांझी ने इसको लेकर बड़ी बात कह दी है। उन्होंने कहा है कि ‘बाबा साहेब का संविधान देश के धर्मनिरपेक्षता की नीति पर आधारित है जो हमें समानता का भी अधिकार देता है। UCC के अनुपालन में किसी प्रकार के दांव पेच की बात करना मेरी समझ में गैर संवैधानिक है जिसे मोदी जी के नेतृत्व वाली हमारी सरकार ने काफी सोच समझकर लागू करने का निर्णय लिया है।’
‘ठाकुर का कुआं’ के बाद आया ‘तालाब का पानी’
जीतन राम मांझी ने अपने ताजा बयान में सामाजिक समानता की बात करते हुए ‘तालाब का पानी’ का मुहावरा इस्तेमाल किया। उनका कहना है कि अब सबको तालाब का पानी पीना होगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब बिहार में जाति, आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक बहस तेज है।
मांझी के बयान की राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जा सकती है, लेकिन उनके कथन का प्रमुख संदर्भ सामाजिक बराबरी से जुड़ा हुआ है। बिहार की राजनीति में जातीय पहचान और सामाजिक न्याय लंबे समय से चुनावी विमर्श के महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं।
मांझी ने प्रधानमंत्री मोदी की शैली का किया जिक्र
अपने बयान में जीतन राम मांझी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की कार्यशैली का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सरकार चेहरा देखकर काम नहीं करती और सभी के लिए समान रूप से काम करने की बात कही।
मांझी का यह बयान उनकी राजनीतिक स्थिति और NDA के भीतर उनकी भूमिका के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि, किसी बयान से गठबंधन की आगामी रणनीति या चुनावी समीकरणों का निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
बिहार में सामाजिक न्याय फिर बना बड़ा मुद्दा
बिहार में सामाजिक न्याय का मुद्दा राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहा है। जातीय प्रतिनिधित्व, आरक्षण और पिछड़े तथा वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी को लेकर अलग-अलग दल समय-समय पर अपनी रणनीति सामने रखते रहे हैं।
ऐसे में ‘तालाब का पानी’ वाला मांझी का बयान सामाजिक बराबरी के विमर्श को फिर से चर्चा में लाता है। खासतौर पर तब, जब राज्य की राजनीति में विभिन्न सामाजिक समूहों को साधने की कोशिशें लगातार दिखाई दे रही हैं।
UCC को लेकर NDA के भीतर भी अलग-अलग बयान
UCC पर बिहार में राजनीतिक बहस पहले से जारी है। हालिया बयानों में BJP की ओर से देशभर में UCC लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने की बात सामने आई है, जबकि JDU नेताओं ने बिहार में इसके प्रावधानों पर विचार-विमर्श की जरूरत बताई है। RJD नेता तेजस्वी यादव ने भी इस मुद्दे को लेकर JDU और BJP पर राजनीतिक आरोप लगाए हैं।
ऐसे माहौल में मांझी का UCC समर्थन वाला बयान बिहार के NDA घटक दलों के अलग-अलग रुख को लेकर चर्चा बढ़ा सकता है। हालांकि, किसी अंतिम नीति या गठबंधन के सामूहिक निर्णय का संकेत केवल इन बयानों के आधार पर नहीं माना जा सकता।
चुनावी राजनीति के बीच बयान के मायने
बिहार में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने के बीच नेताओं के बयान सामाजिक समीकरणों पर केंद्रित होते जा रहे हैं। जीतन राम मांझी लंबे समय से दलित और वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं। ऐसे में ‘तालाब का पानी’ का उनका नया मुहावरा भी सामाजिक समानता के संदेश के रूप में सामने आया है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में इस बयान पर दूसरे राजनीतिक दलों की क्या प्रतिक्रिया आती है और बिहार की चुनावी बहस में सामाजिक न्याय, आरक्षण तथा UCC जैसे मुद्दों को कितना स्थान मिलता है।